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जालंधर फिल्म मुन्ना भाई..में संजय दत्त डीन से सवाल करता है क्या सीरियस पेंशेट के ट्रीटमेंट से पहले फार्म भरना जरूरी है..बात फिल्मी थी लेकिन थी पते की। जिस वक्त मरीज गंभीर हो और उसे जरूरत हो ट्रीटमेंट की तो अस्पताल का स्टाफ उसके अटेंडेंट्स को दौड़ाता है कागजी कार्रवाई पूरी करने के लिए। सोमवार को दिल्ली के सफदर जंग हॉस्पिटल में इसी के चलते दो बच्चों ने दम तोड़ दिया। इसी के मद्देनजर सिटी रिपोर्टर ने पूर 5 घंटे बिताए शहर के सिविल अस्तपाल में और देखा कि इमरजेंसी में आने वाले मरीजों के साथ क्या है रवैया-
सिविल हॉस्पिटल में सीरियस पेशेंट को पहले एडमिट किया जाता है.. फिर की जाती है कागजी कार्रवाई यह कहना है सिविल हॉस्पिटल के मैडीकल सुपरिंटेंडेंट का, जबकि हकीकत कुछ और है। यहां इलाज के पहले मरीजों को करना पड़ता है इंतजार। जब तक कागजी कार्रवाई पूरी नहीं हो जाती ट्रीटमेंट शुरू नहीं होता। जबकि कुछ मामलों जैसे हार्ट प्रॉब्लम, ब्रेन स्ट्रोक, पैरालिसिस, बर्न केस, जहर आदि में यदि तुरंत ट्रीटमेंट शुरू न हो तो मरीज की मौत भी हो सकती है।
हमने देखा कि यहां मरीजों को दाखिल तो किया जाता है लेकिन सबसे ज्यादा जरूरी होता है मरीज के साथ किसी बड़ी सिफारिश का नत्थी होना। हमने देखा कि मामूली लोगों को दरकिनार करते हुए पहुंचवाले लोगों को इलाज में तरजीह दी जा रही थी।
सिफारिश है तो बल्ले-बल्ले यहां भीम सेन नाम के डायबिटीज के पेशेंट को लाया गया। पहुंच ऊपर तक थी इसलिए पेशेंट को इमरजेंसी वार्ड में एडमिट कर ट्रीटमेंट शुरू कर दिया गया और बेटे को कागजी कार्रवाई के लिए भेज दिया गया। वापस आकर भीम सेन का बेटा कहता है आईसीयू में कब शिफ्ट करेंगे यहां काफी गर्मी है। भीम सेन के सन इन लॉ ने जवाब दिया बिना सिफारिश यहां कुछ नहीं होता। एक डॉक्टर मेरे जानकार हैं, उनसे बात करता हूं।
बेटे ने कहा, मिनिस्टर की सिफारिश लगवाई तो है तभी स्टाफ इतनी केयर कर रहा है। रिपोर्ट 4 बजे के बाद आएगी, लेकिन सिफारिश के चलते 1 बजे ही उन्होंने आईसीयू में शिफ्ट करवा लिया। हमने जब पूछा यहां क ाफी अच्छा ट्रीटमैंट होता है क्या, तो उनका जवाब था सिफारिश हो तो अच्छा ट्रीटमैंट नहीं तो नहीं। बात सोलह आने सच निकली, जो उसी वार्ड के बाहर दिख गई।
वहां कोई नहीं मरीज को लेकर उनके रिश्तेदार हॉस्पिटल में आते हैं। वार्ड के बाहर बैठे रहते हैं, लेकिन कोई पूछने वाला तक नहीं। ड्यूटी रूम में बैठा डॉक्टर उनको नर्स के पास जाने क ो कहता है। वहीं नर्स कहती हैं डॉक्टर के पास जाओ। यह सुनते-सुनते दो बज जाते हैं और पेशेंट की हालत और खराब हो जाती है। वह बेहोश होकर गिर जाता है। इतने में एक नर्स पेशेंट को पकड़ती है और रिश्तेदार को डांटती है।
जब हमने पूछा मरीज बार-बार गिर रहा है आप इसको बैड पर क्यों नहीं ले जाते? जवाब था आप कौन हैं। जब हमने नर्स ड्यूटी रूम में जाकर पूछा पेशेंट को एडमिट क्यों नहीं किया जा रहा है तो जवाब मिला जो पूछना है डॉक्टर से पूछो। जब इसकी शिकायत डॉ. हरजीत सिंह से की गई तो उन्होंने नर्स को बुला कर पूछा क्या हुआ। हमने कहा आखिर इनकी जिम्मेदारी क्या है? नर्स ने कहा हम नहीं उठा रहे थे तो आप उठा लो, हमारी कोई रिस्पांसिबिलिटी नहीं है। डॉ. हरजीत ने कहा, मैं कुछ नहीं कर सकता। आप मैडीकल सुपरिंटेंडेंट से बात करें।
सिविल हॉस्पिटल में सख्त इंस्ट्रक्शन है कि सीरियस पेशेंट का पहले ट्रीटमैंट शुरू किया जाए, बाद में कागजी कार्रवाई। अगर ऐसा बिहेव किया गया है तो हम एक्शन जरूर लेंगे। मामले की जांच कर जो भी गलती होगी उसके हिसाब से एक्शन लिया जाएगा। -डॉ. जसबीर, मैडीकल सुपरिंटेंडेंट