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वेदों में भी अग्रणी माने गए हैं गणॆश‌: कामेश्वर उपध्याय

भगवान गणॆश‌ की उत्पत्ति परम तत्व मानसी उपस्थिति है। वेदों में उन्हें महानायक के रूप में अग्रणी माना गया है। तंत्रों में गणॆश‌ की उपस्थिति आदिम देवता के रूप में है। चतुर्थी तिथि के देवता के रूप में गणॆश‌ ज्योतिष एवं धर्मशास्त्र में पूजित हैं। इसलिए हरएक महीने के चतुर्थी तिथि के दिन गणपति एवं चंद्रमा की पूजा होती है। कलियुग में भी भगवान गणॆश‌ का अत्यंत महत्व है। ये बातें प्रख्यात ज्योतिषाचार्य और बनारस हिंदु विश्वविद्यालय के पूर्व व्याख्याता कामेश्वर उपाध्याय ने भास्कर डॉट कॉम से हुई खास बातचीत में कही।

भगवान गणॆश‌ कौन हैं और उनका महात्म्य क्या है?

भगवान गणॆश‌ आदिदेव के रूप में सृष्टि में पूजित हैं, उनकी उत्पत्ति परम तत्व मानसी उपस्थिति है। फलत: भगवान शिव एवम आद्या शक्ति द्वारा भी वे स्वीकृत होते हैं। वेदों में उन्हें महान नायक के रूप में अग्रणी माना गया है।ऋषियों द्वारा स्तुत होने के कारण वे वैदिक देवता भी हैं। उनकी सूंड़ ब्रह्मांड संरचना का प्रतीक है। यद्यपि तंत्रों में गणॆश‌ की उपस्थिति आदिम देवता के रूप में है, और दक्षिण और वाम दोनों पद्धतियां गणॆश‌ तंत्र में जुड़ी हुई हैं। गणॆश‌ विज्ञान के ऊपर वेद तंत्र और पुराण में काफी विवेचन हुआ है। वास्तुशास्त्र के ग्रंथों में भी शिव पंचायक में जहां उनकी स्थापना होती है वहीं भोग और मोक्ष दोनों को सूचित करती है।

कई जगह गणॆश‌ जी की मूर्तियों में सूंड़ दाहिनी ओर तो कहीं बाईं ओर होता है। ऐसा क्यों?
भगवान गणॆश‌ की सूंड़ यदि दाहिनी ओर है, तो सांसारिक समृद्धि की प्राप्ति और बायीं ओर मुड़ी सूंड़ वाली प्रतिमा की अराधना से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए देश भर में गणॆश‌ की प्रतिमा वाम आवर्त और दक्षिण आवर्त दोनों है।उत्तर भारत में दक्षिण आवर्त प्रतिमा का प्रचलन है जबकि देश के अन्य भागों में वाम आवर्त वाले भगवान गणॆश‌ का पूजन किया जाता है। मंदिरों में जहां मूर्तियों की स्थापना की जाती है वहां वाम आवर्त वाले गणॆश‌ जी स्थापित होते हैं, क्योंकि इस प्रतिमा की पूजा से मोक्ष एवं आत्मस्वरूप का ज्ञान प्राप्त होता है।

चतुर्थी के दिन गणॆश‌ पूजा होने का खास प्रयोजन क्या है?
चतुर्थी तिथि के देवता के रूप में गणॆश‌ ज्योतिष एवं धर्मशास्त्र में पूजित हैं। इसलिए हरएक महीने के चतुर्थी तिथि के दिन गणपति एवं चंद्रमा की पूजा होती है। कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहते हैं। शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को वैनायकी चतुर्थी कहते हैं। इन दोनों चतुर्थियों के नाम से यह साफ होता है कि कृष्ण पक्ष वाली चतुर्शी संकट का निवारण करती है जबकि शुक्ल पक्ष वाली चतुर्थी पुत्र और विद्या को प्रदान करती है। जिस तरह प्रतिपदा तिथि के देवता अगिA, द्वितीया के देवता ब्रrा, तृतीया के गौरी (शक्ति) हैं, उसी तरह चतुर्थी के देवता गणॆश‌ हैं। तृतीया एवं चतुर्थी धर्मशास्त्र में युग्म तिथियां हैं। ये तिथियां माता और पुत्र की तिथियां हैं। मां गौरी और पुत्र गणॆश‌ की तिथि तृतीया एवं चतुर्थी होने के कारण धर्मशास्त्र में इन दोनों में परस्पर अन्वय बनता है। यानी चतुर्थी (गणॆश‌स्य मातृ विधा प्रशस्यते)। गणॆश‌ की उत्पत्ति और उनका संबंध चतुर्थी एवं बुधवार दिन से है, इसलिए संपूर्ण देश में भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी यानी वैनायकी चतुर्थी को गणॆश‌ के सद्भाव से जोड़कर देखा जाता है।

एक ऐसी भी मान्यता है कि भाद्र शुक्ल पक्ष चतुर्थी को चंद्रमा का दर्शन नहीं करना चाहिए। इसके पीछे क्या कारण है और यह प्रसंग गणॆश‌ चतुर्थी से कैसे जुड़ा है?
गणॆश‌ की पूज्यता देवकाल से लेकर महाभारत काल तक अक्षुण्ण चलती रही, लेकिन एक छोटी सी घटना घटित हुई जिसमें भाद्र शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को चंद्रमा का दर्शन करने के बाद भगवान श्री कृष्ण को स्यमन्तक मणि चुराने का झूठा आरोप लगा। बहुत तपस्या एवं स्यमन्तक मणि की प्राप्ति के बाद उस अपवाद से भगवान श्री कृष्ण मुक्त हो सके थे। तब से लेकर आज तक समाज में यह मान्यता बनी हुई है कि भाद्रशुक्ल चतुर्थी के दिन चंद्रमा का दर्शन नहीं करना चाहिए (अद्य चंद्र दर्शनम निषिद्धम)। इस प्रकार से इस महोत्सव प्रधान गणॆश‌ चतुर्थी के साथ चंद्रमा का निषिद्ध आकर जुड़ गया। इसे लोक में ढेल चौथ कहते हैं। यदि इस दिन चंद्रमा का दर्शन हो जाए, तो अपवादनाशक मंत्र का जप करना चाहिए, या दूसरे के घर पर पत्थर फेंकना चाहिए जिससे वह गुस्स मे अपशब्द कहे, तो अशुभ का नाश हो जाए। इसे निषिद्ध चंद्र दर्शन का उपचार कहते हैं।अपवाद दूर करने का मंत्र(सिंह: प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हत:।।सुकुमारक मारोदीस्तव हेयष स्यमन्तक:)

गणॆश‌ तत्व का परम रहस्य क्या है?
भगवान गणॆश‌ अनन्त आकाश में स्वस्ति पथ की तरह विराट रूप में विराजमान हैं। उन्हें भक्तों ने विष्णु के विराट रूप की तरह भी देखा है। शिव एवं पार्वती के विवाह से पूर्व वार्वती की तपस्या की रक्षा हेतु गणॆश‌ का उद्यत खड़ा रहना उनकी विराट स्थिति की सूचना है। मां पिता के परिणय से पूर्व पुत्र का उपस्थित होना गणॆश‌ तत्व का परम रहस्य है। सृष्टि में गणॆश‌ तत्व शक्ति के स्पंद से उत्पन्न होता है जिससे यदि शिवतत्व टकराता भी है, तो गणॆश‌ तत्व उसे पुन: अमरत्व प्रदान करता है। गणॆश‌ का मस्तक काटकरके भी हाथी का मस्तक जोड़कर महान रुद्र देवता ने अंतरिक्ष वासी विराट गणॆश‌ तत्व की स्वीकृति को प्रदान किया। वेदों में रुद्र को आदि देव माना गया है, लेकिन वह रुद्र विराट गणपति से यदि अनजाने में टकराता है तो शक्ति तत्व हस्तक्षेप करके शिव को गणॆश‌ का महत्व बतलाता है। यह बहुत उलझा हुआ गुप्त एवं गंभीर रहस्य है। तब से लेकर आजतक भगवान गणॆश‌ विवाह मंडप में गौरी के साथ पूजित हैं। गौरी आदिशक्ति हैं, शिव विराट शक्ति हैं जो उत्पादक हैं तथा गणॆश‌ व्यवस्थापक शक्ति हैं। गणॆश‌ न रहें तो सृष्टि की व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाए। गणॆश‌ का यह रहस्य आगमों में विस्तार के साथ वर्णित है।

गणॆश‌ जी का मूल मंत्र क्या है? गणपति पूजा में दूर्वा का क्या महत्व है?
भगवान गणॆश‌ का मूलमंत्र ऊँ गं गणपतये नम: है। उनका वाहन चूहा है, जो सभी प्रकार के विघ्नों को कुतर डालता है। मोदक उनका प्रिय मिष्ठान है, साथ ही दूर्वाघास उनकी प्रिय वनस्पति है। दूर्वा का महत्व है कि वह पत्थर पर भी उग आती है और हरेक ओर से एक नई शाखा को निकालकर निरंतर फैलती जाती है। इसीलिए वेदों में दूर्वा के लिए जो मंत्र आया है। वो वंश वृद्धि के लिए हवन में प्रयुक्त होने वाला औषधीय द्रव्य के रूप में है। गणॆश‌ पूजा में 21 दूर्वा का बहुत महत्व है। गणॆश‌ जी के सुप्रसिद्ध 10 नामों के साथ दो दो दूर्वा चढ़ाते हैं। शेष एक दूर्वा को दसों नाम के साथ चढ़ाया जाता है।

देश के मंदिरों में भगवान गणॆश‌ के भिन्न रूपों में विराजमान हैं। इन रूपों के बारे में संक्षेप में बताएं?
भगवान गणॆश‌ बंगाल में दुर्गा पंडालों में दुर्गा के साथ गणॆश‌ के रूप में बैठे हैं। उज्जैन में महाकाल के साथ आयुष्यवर्धक वरद गणॆश‌ के रूप में हैं, और समस्त महाराष्ट में राष्ट्रीय देवता के रूप में स्वयं मुख्य पीठ पर विराज होकर सिद्धि विनायक के रूप में बैठे हैं। उत्कल (उड़ीसा) और गुजरात में भी वे वैष्णव जनों के विघA निवारक के रूप में रक्षक है। इस तरह से देश के कोने-कोने में गणॆश‌ विराजमान हैं।

कलियुग में भगवान गणॆश‌ का क्या महत्व है?
कलियुग में विशेष रूप से चंडी, विनायक एवं हनुमान शीघ्र कार्य सिद्धि हेतु सर्व स्वीकृति प्रिय देवता हैं। गणॆश‌ भगवान सुनीता विलियम्स के भी इष्ट देवता हैं।, जो अंतरिक्ष में उसकी रक्षा करते हैँ। ध्येय है कि वेदों में गणॆश‌ एवं रुद्र ही अंतरिक्ष को नियंत्रित करते हुए दिखलाए गए हैं, अत: गणॆश‌ महापर्व और गणॆश‌ महोत्सव पृथ्वी की रक्षा के लिए, धरती पर सनातन मूल्यों की रक्षा के लिए महामनीषी लोकमान्य तिलक द्वारा स्थापित यह राष्ट्रीय महोत्सव है।





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