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सियासी घमासान में सत्रावसान

सम्पादकीय:

जेपीसी बनाओ, संसद चलाओ की एनडीए की जिद के चलते संसद का सत्र एटमी करार पर बहस किए बिना ही समय पूर्व स्थगित हो गया। यह दुर्भाग्यजनक है कि राजनीतिक दलों के अपने हित और अहं का शिकार संसद का सत्र हो रहा है। 14वीं लोकसभा में यह चौथी बार है, जब संसद-सत्र इस तरह स्थगित हुआ है।

देश की जनता के चुने हुए प्रतिनिधि संसद सदस्य के रूप में यहां पहुंचते हैं और उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे देश के हित में विधान, नियम-कानून बनाने के साथ ही आम जनता की भावनाओं और विचारों को अभिव्यक्ति देंगे। संसद में वे उन सवालों से रूबरू होंगे, विचार-विमर्श और बहस कर किसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगे, जो आम जनता के हितों से ताल्लुक रखते हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों का अनुभव यह बताता है कि संसद व विधानसभाएं दलगत राजनीति का अखाड़ा बनती जा रही हैं। बार-बार इस बात की चर्चा होती है कि संसद के सत्र-संचालन में जनता की गाढ़ी कमाई किस तरह जाया हो रही है। लेकिन राजनीतिक दल लाभ-हानि के गणित में लगे रहते हैं।

देखा जाए तो संसद स्थगित करवाकर भाजपा ने एक तरह से कांग्रेस और यूपीए का ही भला किया है। ऐसे में वामपंथियों का यह आरोप भी विचारणीय लगने लगता है कि विपक्ष और खासकर भाजपा के लोग चाहते ही नहीं कि संसद में इस मुद्दे पर बहस हो। उधर भाजपा का आरोप भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि यूपीए और वाम ने समन्वय समिति बनाकर विपक्ष को बिलकुल दरकिनार कर दिया है। बहरहाल बयानों के इस घमासान ने संसद-सत्र का अवसान तो करा ही दिया है। संसद में अपनी असहमति या विरोध दर्ज कराना विपक्षी दलों की जिम्मेदारी है। इसके लिए सत्र से बहिष्कार भी किया जाता है, लेकिन वह सांकेतिक होता है तथा तुरंत ही सदस्य वापस भी आ जाते हैं, ताकि सदन की कार्यवाही जारी रह सके।

संसद के वर्तमान कार्यकाल को देखें, तो राष्ट्रपति के अभिभाषण पर प्रधानमंत्री का धन्यवाद ज्ञापन विपक्षी हो-हल्ले का शिकार हो गया, रेल बजट भी बिना बहस के पारित हो गया। यह परंपरा बनती जा रही है कि अपनी बात मनवाने के लिए विपक्षी दल संसद को नहीं चलने देने पर ही आमादा हो जाते हैं। इसके लिए किसी एक राजनीतिक दल को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता, क्योंकि विपक्ष में रहने वाले हर दल की शैली लगभग ऐसी ही बन गई है। लोकतंत्र में लोक की आस्था और विश्वास को कायम रखने के लिए इस परंपरा को तोड़ना जरूरी है।





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