bhaskar Web English
HomeManoranjanCinemaBollywood Bollywood

बोल 'राधा' बोल कभी तो 'सच' बोल

परदे के पीछे :वैजयंतीमाला की आत्मकथा 'बॉन्डिंग.. अ मेमॉयर' के प्रकाशन और प्रचार की योजना के तहत किताब के अंश अखबारों में प्रकाशित हो रहे हैं। वैजयंतीमाला ने दावा किया है कि राजकपूर से उनका प्रेम-प्रसंग महज फिल्म 'संगम' के प्रचार के लिए रचा गया था और आर.के. के प्रचार विभाग की करतूत ने उन्हें दुख पहुंचाया। राज कपूर के सुपुत्र ऋषि कपूर ने इस दावे को खोखला बताते हुए कहा है कि उस दौरान इस प्रेम-प्रसंग के ही कारण श्रीमती कृष्णा कपूर बच्चों के साथ मरीन ड्राइव स्थित होटल नटराज में लगभग तीन महीने तक रहीं। उस समय ऋषि कपूर की आयु 11 वर्ष थी।

ऋषि कपूर ने यह भी कहा कि डॉ. बाली ने अपनी पहली पत्नी और बच्चों को दुख पहुंचाकर वैजयंतीमाला से विवाह किया और उनकी पहली पत्नी से जन्मा रतन बाली एयर इंडिया में कार्यरत है। ऋषि कपूर इस बात से आहत हैं कि जगजाहिर प्रेम-प्रकरण को केवल प्रचार का हथकंडा कहकर वैजयंतीमाला फिल्मकार राज कपूर का कद घटाने की कोशिश कर रही हैं। राज कपूर की फिल्में प्रचार से नहीं चली हैं वरन् वे अवाम के दिल को कहीं छूती थीं।

दरअसल तीव्र भावना से वशीभूत फिल्मकार अपनी सृजन की अलख जगाकर नायिका को अनोखे नयनाभिराम रूप में प्रस्तुत करता है। स्वयं के इस नए रूप पर मुग्ध नायिका सृजक से प्रेम करने लगती है, जबकि सत्य यह है कि वह स्वयं की छवि से ही प्रेम कर रही है। यह छायाओं का रहस्यमय संसार है। प्रेम वह दिव्य अनुभूति है, जो आपको छायाओं के सत्य को देखने में समर्थ करती है। 'संगम' के ही गीत का अंश है 'सुनते हैं प्यार की दुनिया में दो दिल मुश्किल से समाते हैं, क्या गैर वहां अपनों तक के साये भी न आने पाते हैं.. ये धरती है इंसानों की, कुछ और नहीं इंसान हैं हम, इक दिल के दो अरमान हैं हम'।

अगर आप वैजयंतीमाला की तमाम फिल्में वीडियो पर देखें तो पाएंगे कि वह 'संगम' जैसी जादुई किसी और फिल्म में नहीं लगीं। यह जादू महज फोटोग्राफी नहीं है। राजकपूर ने उन्हें प्रेरित किया, सजाया, संवारा और प्रस्तुत किया। हृदय में प्रेम नहीं हो तो ऐसा रूप भी सामने नहीं आता। वे 'संगम' में सुंदरतम लगी हैं और उन्होंने श्रेष्ठतम अभिनय फिल्म 'गंगा जमुना' में किया है। उन्होंने अपनी किताब में राजकपूर को प्रचारक और दिलीप कुमार को छल करने वाला बताया है। उन्होंने लिखा है कि किस तरह आठ दिन की शूटिंग के बाद फिल्म 'राम और श्याम' से उन्हें बाहर किया और कमोबेश ऐसी ही साजिश फिल्म 'संघर्ष' में सफल नहीं हो पाई। वैजयंतीमाला सुविधाजनक ढंग से यह भूल गईं कि फिल्म 'नया दौर' में मधुबाला को हटाकर उन्हें लिया गया था।

दरअसल सच्ची आत्मकथा लिखना स्वयं के मन की निर्मम चीर-फाड़ करके सारे खून और मवाद को अभिव्यक्ति देने का काम होता है। यह मुश्किल इसलिए भी है कि मनुष्य सबसे अधिक झूठ अपने आप से बोलता है और कालांतर में इन झूठों को सच भी समझने लगता है। अत: अधिकांश आत्मकथाएं मनुष्य नहीं वरन उसकी छवियों का सुविधाजनक विवरण मात्र होती हैं।

यह भी अजीब बात है कि तथाकथित गल्प में जीवन के अंश होते हैं और तथाकथित आत्मकथा में मनगढ़ंत गल्प होता है। दरअसल टूटे हुए आइनों में पूरी छवि नहीं दिखती। दिन-प्रतिदिन के जीवन में हर मनुष्य मन ही मन कुछ बातें हमेशा करता रहता है। इस आंतरिक संसार में घटी सारी बातें कभी उजागर नहीं होतीं और जो उजागर होता है वह सब सचमुच घटित नहीं होता।

मनुष्य राज कपूर पर आरोप लगाए जा सकते हैं, परंतु फिल्मकार राज कपूर की निष्ठा पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता। मनोरंजक फिल्में अवाम के लिए रचना उनका काम नहीं वरन् उनका धर्म रहा है। किसी नकली प्रेम प्रकरण के प्रचार पर उनकी लोकप्रियता आधारित नहीं है। उन्होंने अपने जीवन में वैजयंतीमाला के आने के पहले और जाने के बाद भी सफल फिल्में रची हैं।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: