नई दिल्ली:
‘राम और रावण के बीच कभी युद्ध हुआ ही नहीं और न ही सीता का अपहरण हुआ। राम कभी लंका भी नहीं गए।’ यह कहना है केंद्र सरकार का। असल में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर हिंदू मान्यताओं के अनुसार रामसेतु की अवधारणा को पूरी तरह बेबुनियाद बताया है।
केंद्र का कहना है कि इस बात का कोई वैज्ञानिक सबूत नहीं है कि साढ़े छह हजार वर्ष पहले भगवान राम ने यह पुल बनवाया था। हालांकि हिंदू मान्यताओं के अनुसार यह वही रामसेतु है, जिसका जिक्र रामायण में किया गया है। ऐसे में यदि केंद्र की मानें तो रामायण ग्रंथ में बड़े पैमाने पर संशोधन करने की जरूरत है।
पूर्व केंद्रीय मंत्री और जनता पार्टी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने याचिका दायर कर रामसेतु पुल को तोड़ने पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी। इस पर ३१ अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने सेतु समुद्रम परियोजना के लिए रामसेतु तोड़ने पर रोक लगा दी थी। जस्टिस बीएन अग्रवाल और जस्टिस पीपी नाओलेक र की बेंच ने क हा था कि 14 सितंबर तक रामसेतु को किसी तरह की क्षति नहीं पहुंचाई जाए।
तथ्य छिपाने का आरोप : हलफनामे के अनुसार याचिकाकर्ता ने कोर्ट से यह तथ्य छिपाया है कि मार्ग बनाने के लिए 30 हजार मीटर लंबे पुल का केवल सौवां (300 मीटर चौड़ा और 12 मीटर गहरा) हिस्सा ही तोड़ा जा रहा है, पूरा पुल नहीं। याचिकाकर्ता सुब्रमण्यम स्वामी पर कड़ा जुर्माना लगाने और पुल तोड़ने पर लगे प्रतिबंध को समाप्त करने की मांग की गई है।
यह भी कहा गया है कि याचिकाकर्ता के इस तर्क को भी नहीं माना जा सकता कि इस पुल को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया जाए।