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रफ्तार धीमी, नतीजे बेहतर

राजधानी हरियाणVultureपांच साल पहले पिंजौर के जोधपुर गांव में खुले एशिया के सबसे बड़े गिद्ध प्रजनन केंद्र में प्रजनन का कार्य प्राकृतिक कारणों से धीमा जरूर है, लेकिन नतीजे उत्साहजनक हैं। वर्ष 2004 में प्रजनन केंद्र घोषित हुए केंद्र में तब केवल 25 गिद्ध थे, लेकिन आज इनकी तदाद बढ़ कर 113 हो गई है। हैरत इस बात की है कि जिस दवा 'डायकलोफेनिक सोडियम'से गिद्धों का मरना पाया गया, वह आज भी धडल्ले से बिक रही है।

2004 में हुआ खुलासागिद्ध क्यों मर रहे हैं, इस बात का खुलासा वर्ष 2004 में कई मरे हुए और बीमार गिद्धों के पोस्टमार्टम और व्यापक जांच से संभव हो सका। तब तक जोधपुर स्थित गिद्ध केंद्र पर 65 गिद्धों की जांच की जा चुकी थी। इस वक्त केंद्र ने तीन बड़े और छह छोटे पिंजरों में गिद्धों को रखा गया है।

एक साल में एक अंडागिद्ध एक साल में केवल एक अंडा देता है। एक गिद्ध के बच्चे को वयस्क होने में पांच साल लगते हैं। उसके बाद ही वो अंडा देने लायक होता है। कहा जा सकता है कि कुदरत की तरफ से गिद्ध के प्रजनन की प्रक्रिया अन्य पक्षियों के मुकाबले काफी धीमी है।

आसान नहीं गिद्ध पकड़नाप्रजनन केंद्र के सांइटिस्ट डाक्टर देवोजीत दास ने भास्कर से बातचीत में कहा कि गिद्ध को पकड़ना आसान नहीं, ये हिंसक हो जाते हैं। कोई बीमारी हो तो उसके मनुष्य को लगने का खतरा बना रहता है। इससे बचने के लिए प्रजनन केंद्र पर तैनात सभी कर्मचारियों को टीके लगाए जाते हैं। पहनने के लिए विशेष ड्रेस दी जाती है।

अंदर जाने की है मनाहीगिद्धों की जिंदगी में खलल न पड़े और उनकी प्रजनन प्रक्रिया प्रभावित न हो इसके लिए कड़े नियम बनाए गए हैं। पिजरे जहां इन्हें रखा गया है वहां किसी के भी भीतर जाने पर मनाही है। खाना और पानी बाहर से ही दिया जाता है। आपात स्थिति में ही डाक्टर अंदर जाते हैं। गिद्धों के उड़ने के लिए स्पेस दे कर पिंजरों के उपर जाल लगाए गए हैं। केंद्र मे इस वक्त 113 गिद्धों में चार प्रजातियों के गिद्ध हैं। इनमें व्हाईट बैक कल्चर, लॉंग बिल वल्चर, सिलेंडर बिल वल्चर और हिमालयन ग्रिफन शामिल हैं।

जिंदा नहीं मरा हुआ खाते हैकुदरती बात है कि गिद्ध कभी भी जिंदा पशु का शिकार नहीं करते, उन्हें केवल मरे हुए जानवर का गोश्त ही पसंद है और वह उसे ही खाते हैं। सप्ताह में दो बार भोजन की जरूरत पड़ती है गिद्धों को। इसके लिए उन्हें प्रजनन केंद्र में सप्ताह में 15 बकरियों का मास मार कर परोसा जाता है। क्लोज सर्किट कैमरों और गिद्ध को लगी 'चिप' से उन पर नजर रखी जाती है।

''ड्रग कंट्रोलर ऑफ इंडिया को डायकलोफेनिक सोडियम नामक दवा की बिक्री बंद करने के लिए लिखा गया था, लेकिन हैरत की बात ये है कि पशुओं के लिए प्रयुक्त हो रही यह दवा आज भी बिक रही है और इससे रहे सहे गिद्ध भी मर रहे हैं।डाक्टर देवोजीत दास





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