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भारतीय आर्ट के दीवाने हो सकते हैं कम

नई दिल्ली. न्यूयॉर्क में इस सितंबर में होने वाली पहली भारतीय कंटेंपरेरी आर्ट नीलामी में लोग रुचि लेंगे या नहीं, यह सवाल आर्ट मार्केट के कई जानकारों को परेशान कर रहा है।

मैनहटन के एक ऐसे ही एक डीलर का कहना है कि इस नीलामी के दौरान दाम काफी गिर सकते हैं। इसकी वजह न्यूयॉर्क में फंड्स में कमी और दूसरे कंटेंपरेरी आर्ट्स कलेक्टर्स का होना है। इस बार क्रिस्टी और सदबी ने कुछ दिन पहले ही अपनी सेल शुरू कर दी है। इसके अलावा सदबी ने अपनी भारतीय सेल को दो हिस्सों में बांट दिया है - 19 सितंबर को 101 लॉट्स और 21 सितंबर को 81 लॉट। क्रिस्टी की भारतीय सेल इन दोनों के बीच आ गई है, जो 20 सितंबर को दक्षिण भारतीय आधुनिक और समसामयिक आर्ट सेल के रूप में आयोजित की जाएगी।

आर्ट कलेक्टर्स और भारतीय आर्ट के डीलर्स का कहना है कि भारतीय कंटेंपोरेरी आर्ट के लिए बोलियां उनकी डिमांड और मजबूत उदाहरणों के अलावा बारगेनिंग पर आधारित होंगी। इसलिए बेहतरीन काम के लिए दाम ज्यादा मिलेंगे और औसत दर्जे के काम के लिए बेहद कम।

इससे पहले कुछ महीनों में नीलामियों में हिस्सा लेने वालों ने नए आर्टिस्टों के लिए अपने पर्स खोलने में कुछ हिचक दिखाई है। मैनहटन के इस डीलर के मुताबिक कुछ खास आर्टिस्ट्स के लिए बोलियां सुधरेंगी भी, जिन्हें गलत प्राइस रेंज में रख दिया गया है। उसका कहना है कि कुछ आर्ट पीस वास्तव में उस जगह नहीं हैं, जहां उन्हें होना चाहिए।

इधर बिलियोनेयर एली ब्रोड ने अमेरिकी मीडिया में हाल में ही कहा था कि कंटेंपोरेरी आर्ट के ज्यादातर खरीदार या तो ऐसे फंड मैनेजर हैं, जिन्होंने मार्केट में पैसा खो दिया है या फिर वे निवेशक हैं जिनका बुरा वक्त चल रहा है और अपना काफी पैसा लगा चुके हैं। ब्रोड ने इसी साल जून में आशा जताई थी कि आर्ट का बाजार क्रैश की तरफ बढ़ रहा है जिस तरह 1990 के दशक में हुआ था, जब कीमतें आधी रह गई थीं। ब्रोड का मानना है कि आर्ट मार्केट में अभी कीमतों में काफी एडजस्टमेंट होगा, हालांकि अभी 6 महीनों से एक साल के बीच ऐसा नहीं हो सकता।

इधर, भारत में सैफ्रन आर्ट ने काफी अच्छी सेल की है और अतुल ढोढिया और सुबोध गुप्ता दोनों ने ही 10 लाख की सीमा पार कर ली है। हालांकि न्यूयॉर्क में डीलर्स कहते हैं कि भारतीय आर्ट चायनीज आर्ट के मुकाबले कहीं नहीं है। चायनीज आर्ट वास्तव में मार्केट में जबर्दस्त पकड़ रखे है। सदबी के चायनीज सिरेमिक्स और आर्ट डिपार्टमेंट के हैड जो हिन यांग के मुताबिक उन्होंने चार साल में अपना बिजनेस चार गुना कर लिया है। गौरतलब है कि सदबी द्वारा पिछले सितंबर में की गई चार नीलामियों में चायनीज एंटीक्स और पेंटिंग्स ने 43 लाख डॉलर के बिक्री आंकड़े को छू लिया। क्रिस्टीज ने पिछले साल अपनी सात नीलामियों में करीब 40 लाख डॉलर की सेल हासिल की।

आर्ट एशिया पैसिफिक की एक रिपोर्ट के मुताबिक एशियन कंटेंपोरेरी आर्ट की कीमतें पिछले तीन साल में तीन गुनी हो चुकी हैं। लेकिन आर्ट फंड्स ज्यादातर चायनीज काम पर अपना फोकस कर रहे हैं और इसे देखते हुए इधर चीन में कंटेंपोरेरी आर्ट की गैलरीज बढ़ती जा रही हैं। शंघाई आर्ट मेला इस बात का जीता जागता प्रमाण है। हालांकि नीलामीघरों ने कंटेंपोरेरी और आधुनिक भारतीय कला की सेल को भी बढ़ावा दिया है। क्रिस्टी और सदबी दोनों की ही सेल एस्टीमेट्स और आंकड़ों में भी इस बात की निशानदेही होती है।

लेकिन मई में लंदन में साउथ एशियन आर्ट की नीलामी में मार्केट की दिशा का सही तौर पर पता चला। तकरीबन हर पांच में एक लॉट को खरीदार नहीं मिल सका क्योंकि नए टैक्सों ने कुछ भारतीय कलेक्टर्स को इससे दूर रखा। इसके बाद क्रिस्टी के 19 फीसदी आर्ट वर्क के लिए कोई खरीदार नहीं मिला और यही हाल कुछ वक्त बाद सदबी के साथ हुआ, जिसके 36 पीस बगैर बिके ही रह गए।





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