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समय के साथ बढ़ी श्रीजी की भी ऊंचाई

ग्वालियर:lord

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने सामाजिक एकता के लिए महाराष्ट्र में सार्वजनिक गणोश उत्सव की परम्परा का आगाज किया, जो आज देश के कोने कोने में उसी जोशो-खरोश के साथ मनाया जाता है। इससे अछूता ग्वालियर भी नहीं है। महाराष्ट्र की तरह ही शहर में भी बड़ी और आकर्षक प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। इन प्रतिमाओं को तैयार करने के लिए कुछ कलाकार बाहर से आते हैं तो ज्यादातर प्रतिमाएं शहर के कलाकार ही बनाते हैं।

15 सितंबर से आरंभ हो रहे गणोशोत्सव के लिए विभिन्न सार्वजनिक मंडलों ने मूर्ति बनाने का आर्डर दे दिया एक महा पहले दे दिया था। किसी ने शिव परिवार की मूर्ति बनवाई है, तो किसी ने सिंहासन पर विराजमान गणपति की प्रतिमा।

ग्वालियर में पिछले दस सालों में गणोश महोत्सव का स्वरूप भव्य रूप ले चुका है। पहले जहां नगर में चन्द स्थानों पर ही छोटी-छोटी गणोश प्रतिमाएं स्थापित की जाती थीं। आज स्थिति बिलकुल विपरीत है। शहर के अधिकतर चौराहों और गलियों में न केवल गणोश प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं बल्कि पूरे गणोश महोत्सव के दौरान रंगारंग कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। यही वजह है कि शहर के कलाकारों के पास बहुत काम है।

अब बड़ी मूर्तियों की है डिमांड
साठ साल से मूर्ति बनाने का काम कर रहे लक्ष्मण कुमार प्रजापति का कहना है कि आज से दस-पन्द्रह वर्ष पहले डेढ़ से दो फीट ऊंची मूर्तियां लोग बनवाते थे। लेकिन अब पांच से सात फीट ऊंची प्रतिमा बनवाने के अधिक आर्डर आये हैं।

छह फीट ऊंची करीब 15 मूर्तियों के आर्डर अभी तक आ चुके हैं। उन्होंने बताया कि इस बार उनके पास सिंहासन पर बैठे गणोश जी की प्रतिमा की अधिक डिमांड आयी है। छह फीट ऊंची प्रतिमा बनाने में करीब एक सप्ताह का समय लग जाता है तथा इसे बनाने में डेढ़ हजार का खर्चा आता है और इसे वह पांच हजार रुपये से कम में नहीं बेचेंगे।

शौक बना व्यवसाय
मूर्तिकार मथुरा प्रसाद का कहना है कि उसे बचपन से मूर्ति बनाने का शौक था। इसी शौक के चलते 12 साल पहले उन्होंने मूर्ति बनाने का काम शुरू किया था। जो अब उनकी रोजीरोटी का साधन बन गया है। मथुरा प्रसाद ने इस बार अर्धनारीश्वर के साथ गणोश जी की आकृति की प्रतिमा इस साल नई बनायी हैं। शेष मूर्तियां उसी आकृति की हैं जो उन्होंने पिछले साल बनाई थीं।

मथुरा प्रसाद के पास अभी 25 मूर्तियां बनाने का आर्डर आया है। जो पिछले साल से अधिक है। नई आकृति की मूर्ति बनाने में करीब दो हजार रूपये का खर्चा आया है उसकी ब्रिकी वह पांच हजार रुपये में करेंगे। नई आकृति की मूर्ति बनाने में 12 कलाकारों को चार दिन का समय लगा है।

शहर के साथ देहात से भी आ रही है डिमांड
35 साल से मूर्ति बनाने का व्यवसाय करने वाले धनीराम का कहना है कि गणोश प्रतिमाएं पहले शहर में ही स्थापित होती थीं,लेकिन अब देहात से भी मूर्तियों की डिमांड आने लगी है। लोगों की डिमांड के साथ-साथ इस साल शिवलिंग के साथ गणोश जी तथा शिव-पार्वती के साथ गणोश जी आकृति की नई मूर्तियां बनायी हैं। नई आकृति की मूर्ति बनाने में तीन हजार रुपये की लागत आयी है ,जिसे वह पांच हजार रुपये से अधिक में बेचेंगे।

किससे बनती हैं मूर्तियां
मूर्ति बनाने के लिए मूर्तिकार मिट्टी, प्लास्टर आफ पेरिस, पियार (सूखी घास),लकड़ी का पट्टा, गौंद,कागज, भूसा, तार, सूतली और जूट की बनी बोरी तथा रंग।





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