अभिमत:
गीता को सांस्कृतिक रूप से राष्ट्रीय धर्मग्रंथ मान लेने में मैं कोई हर्ज नहीं मानता। इस मुद्दे पर बात का बतंगड़ बनाने का भी कोई अर्थ नहीं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश ने अपना मत प्रकट किया है न कि ऐसा कोई निर्देश या निर्णय दिया है। न्यायालय ने ही कुछ समय पूर्व हिंदू धर्म की व्याख्या की थी। जो वास्तविक और तर्कसंगत है, उस बात को हवा में नहीं उड़ाया जा सकता।
मेरा मानना है कि गीता जाति-पांति और धर्म से ऊपर है। उसके दर्शन, उसके सिद्धांत और उसके संदेश सबके लिए हैं। गीता अपने आप में किसी धर्म की व्याख्या नहीं है। यही वजह है कि दुनिया की अनेक भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ है और दर्शनशास्त्री तथा सिद्धांतकार इसमें निहित तत्वों व तथ्यों को मानते हैं। मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूं कि गीता को सांस्कृतिक दृष्टि से राष्ट्रीय ग्रंथ माना जाना चाहिए।
हमारे देश में तुष्टीकरण की राजनीति का अजीब सा चलन चल पड़ा है। वंदेमातरम् गाने की बात हो तो विवाद। एक बार संस्कृत भाषा पढ़ाने की बात उठी तो कहा जाने लगा कि अरबी भी पढ़ाई जानी चाहिए। भारत मुगल शासकों के आने से पहले से भारत है। हमारी संस्कृति और परंपराएं सनातन हैं। यदि उसकी बात की जाए, तो उसके मुकाबले किसी दूसरे धर्म और उसकी संस्कृतियों को नहीं खड़ा कर देना चाहिए।
यह दुर्भाग्य है कि देश में प्राय: हर राजनीतिक दल जाति, धर्म और संप्रदाय को आधार बनाकर राजनीति करता है और इसके चलते वास्तविक मुद्दे विवाद में फंस जाते हैं। यदि हाईकोर्ट के न्यायाधीश महोदय ने गीता के बारे में अपनी राय व्यक्त न भी की होती, तो भी मैं यही कहता कि गीता भारत की पहचान है, गीता भारत की अस्मिता है। इसे संविधान में शामिल किया जाए या नहीं, लेकिन सांस्कृतिक रूप से गीता भारत का राष्ट्रीय ग्रंथ है और रहेगा।
-नरेंद्र कोहली ख्यातिलब्ध उपन्यासकार हैं।