मुंबई. मध्यप्रदेश के एक छोटे से जिले विदिशा के एक कस्बे गंजबासौदा से ताल्लुक रखते हैं जगदीप सिंह दांगी। जगदीप को इस साल लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्डस में शामिल किया गया है क्योंकि उन्होंने इंटरनेट की दुनिया में कीर्तिमान रचते हुए पहला हिंदी इंटरनेट एक्सप्लोरर बनाया है। इतना ही नहीं, अंग्रेजी की दुविधा को और खत्म करने के लिए उन्होंने अंग्रेजी से हिंदी शब्दकोश और ग्लोबल वर्ड ट्रांसलेटर या अनुवादक भी रच दिया है।
भास्कर डॉट कॉम के आग्रह पर जगदीप ने अपनी रचनात्मकता, प्रेरणा और इस पूरे काम में आईं तरह-तरह की मुश्किलों के बारे में विस्तृत जानकारी दी। भारतमाता के माथे की बिंदी कही जाने वाली हिंदी के लिए इतने जरूरी काम को अंजाम देने वाले जगदीप अपनी सफलता की कहानी कुछ इस तरह बयान करते हैं :
1. सफलता के सफर की प्रेरणा :
मैं हिंदीभाषी प्रदेश के एक छोटे से इलाके से ताल्लुक रखने के कारण 12वीं कक्षा तक हिंदी माध्यम से ही पढ़ा और एकाएक एसएटीआई में कंप्यूटर इंजीनियरिंग में दाखिला मिलने पर मैं अंग्रेजी से रूबरू हुआ। अंग्रेजी मेरे सामने किसी पहाड़ से कम मुसीबत नहीं थी। मैं डिक्शनरी में अर्थ खोजते रहता था। इसी कसरत से एक दिन थककर मेरे मन में विचार आया कि मेरा गणित ज्ञान और तर्कशक्ति अच्छी है लेकिन अंग्रेजी नहीं।
बस, मैंने अपने प्लस प्वाइंट पर पूरा फोकस किया और अपने ही साथ कई हिंदीभाषियों की समस्या के निदान के मिशन पर जुट गया। मैंने अंग्रेजी से हिंदी शब्दकोश, अनुवादक और दुनिया भर से जुड़ने के लिए हिंदी इंटरनेट एक्सप्लोरर की रचना का बीड़ा उठाया। भाषा सेतु प्रोजेक्ट के तहत एक हिंदी सॉफ्टवेअर पैकेज तैयार किया और ढेरो किताबें, आईटी पत्रिकाएं और प्रोग्रामिंग भाषाओं के दिन रात के अध्ययन के बाद अपनी कल्पना को एक आकार दे सका।
2. भारत सरकार की उपेक्षा :
मैंने अपनी सफलता की कहानी केंद्र सरकार के सूचना और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के कई वरिष्ठ वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को सुनाई। नमूने दिखाए। डेमो दिए। सभी ने मेरे काम की जमकर तारीफ भी की लेकिन.. दुख है कि भारत सरकार के आईटी मंत्रालय ने इसी तरह के कार्य पर करीब 600 करोड़ रुपए खर्च किए हैं लेकिन मेरा काम काफी बेहतर होने के बावजूद मुझे न तो कोई पहचान मिली और न ही उसका कोई मोल।
3. मप्र सरकार का बेहूदा मजाक :
आईटी विभाग के अवर सचिव अनुराग श्रीवास्तव को जब मैंने अपने काम के नमूने दिखाए तो उन्होंने तारीफ करते हुए मुझसे सॉफ्टवेअर का पूर्ण संस्करण मांगा सिर्फ डेमो वर्जन नहीं और कहा कि वे विश्वास करें। मैंने बातों में न आते हुए डेमो वर्जन देने की ही बात की जो मूल्यांकन के लिए पर्याप्त था ही। डेमो वर्जन 30 दिनों के लिए मान्य था और इस पर श्रीवास्तव ने कहा कि वे मामूली आदमी नहीं हैं और इस स्थिति में वे कुछ नहीं करेंगे।
इसके बाद मैं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से मिला और चौहान ने सचिव इकबाल सिंह वैश, अनुराग जैन और नीरज वशिष्ठ आदि अफसरों की उपस्थिति में इस काम को सराहा और अफसरों से उचित कदम उठाने को कहा। डेमो के बाद सचिव अनुराग जैन ने मुझे मुख्यमंत्री फेलोशिप देने की घोषणा भी की। फिर मैपकोस्ट के निदेशक महेश शर्मा ने जगदीप के काम को जांचने के लिए समिति बनाई और समिति ने एक सकारात्मक रिपोर्ट मुख्यमंत्री के सचिव इकबाल सिंह वैश को पेश की। फिर कागजी कार्रवाई चलती रही और इस पूरे किस्से का अंत यह हुआ कि काफी इंतजार के बाद एक सरकारी अधिकारी ने मुझसे कहा कि फेलोशिप की नीति पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह बंद कर गए हैं।
इसके बावजूद मैंने कई आला अफसरों को अपने सॉफ्टवेअर के परीक्षण संस्करण भेजे लेकिन अब तक मुझे कोई जवाब नहीं मिला।
आइए जानें जगदीप का भाषा सेतु प्रोजेक्ट
इस बेहतरीन प्रोजेक्ट के तहत जगदीप ने तीन हिंदी सॉफ्टवेअर बनाए हैं :
1. हिंदी इंटरनेट एक्सप्लोरर - आई ब्राउजर++
यह विंडोज एक्सप्लोरर और इंटरनेट एक्सप्लोरर का संयुक्त रूप है। इसकी विशेषता यह है कि इसका पूरा इंटरफेस देवनागरी लिपि में है। इसकी मदद से कोई भी हिंदी भाषी सरलता से कंप्यूटर पर खासकर इंटरनेट पर कार्य कर सकता है। इसके साथ ही इस एक्सप्लोरर पर कई फाइलें खोलने की सुविधा भी है, एक ही या अन्य विंडो में। यह एक साथ कई फाइलें सुरक्षित कर सकता है, एक साथ कई फाइलें सर्च कर सकता है। और भी खूबियां :- ऑटो हिस्ट्री व्यूअर- पॉप-अप ब्लॉकिंग- एडिट मोड ऑन-ऑफ- हिंदी यूनिकोड आधारित लिखाई, उसे इंटरनेट पर सर्च करना और हिंदी ईमेल लिखने व भेजने की सुविधा।
2. अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोश :
यह विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम पर आधारित सॉफ्टवेअर प्रोग्राम है। इसकी खासियत यह है कि ये हिंदी से अंग्रेजी और अंग्रेजी से हिंदी दोनों तरह से काम करता है। इसके अलावा खोजे जा रहे अंग्रेजी या हिंदी शब्द के अर्थ के अलावा अन्य समानार्थी शब्द भी उच्चरण सहित तुरंत शो करता है। अन्य खूबियां :- अर्थ के साथ ही मुहावरों व वाक्य खंडों का संग्रह।- शब्दों को फिल्टर करने के लिए विशेष फलन जिनकी मदद से उपसर्ग व प्रत्यय के अनुसार भी सर्च किए जा सकते हैं शब्द।- द्विभाषी ऑनस्क्रीन कीबोर्ड जो माउस से काबू में होता है।- वर्तमान में इसमें 38500 शब्दों का संग्रह है। इसे उपयोग करने वाले और समृद्ध भी कर सकते हैं।
3. ग्लोबल वर्ड ट्रांसलेटर या अनुवादक :
यह ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों ही स्थितियों में काम करता है यानी कि इसके लिए इंटरनेट कनेक्शन होना जरूरी नहीं है। यह विंडोज के किसी भी सॉफ्टवेअर के अंदर काम कर सकता है। इसकी मदद से यदि आप किसी भी शब्द पर माउस से क्लिक करें तो उसका हिंदी अनुवाद और अन्य समानार्थी शब्द उच्चरण सहित दिख जाएंगे। इसे विंडोज के किसी एक एप्लीकेशन पर ही नहीं बल्कि एमएस वर्ड, नोटपैड, एमएसआईआई, फायरफोक्स ब्राउजर आदि किसी भी एप्लीकेशन पर चलाया जा सकता है।
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हिंदी की दुश्मन हिंदी वालों की सोच
80 के दशक के अंत में पंकज कपूर अभिनीत एक सार्थक फिल्म प्रदर्शित हुई थी ‘एक डॉक्टर की मौत’। पूरी कहानी कुष्ठ रोग के एक डॉक्टर की पूरी रिसर्च और उसके सामने आने वाली मुश्किलों पर फोकस थी। होता यूं है कि एक डॉक्टर अपने पूरे समर्पण और दिन रात की लगन के बाद कुष्ठ रोग की दवा ईजाद करता है लेकिन मेडिकल विशेषज्ञों की जांच, सरकारी प्रक्रिया और घटिया दर्जे की प्रतिस्पर्धा के बीच उस डॉक्टर की रिसर्च को मान्यता नहीं मिल पाती और कुछ ही दिनों में किसी और देश के वैज्ञानिक उसी थ्योरी पर आधारित रिसर्च के हवाले से कुष्ठ की दवा खोजने का दावा कर देते हैं। अंतत: वह डॉक्टर अपनी ही खोज पर रिसर्च करने के लिए विदेश से मिली स्कॉलरशिप मंजूर कर भारत छोड़ जाता है।
हमारे हिंदोस्तान में ऐसा क्यों होता है? कुछ ऐसी ही कहानी है जगदीप सिंह दांगी की। एक छोटे से कस्बे से निकलकर आंखों की तकलीफ होते हुए भी अपनी प्रतिभा के बूते पर जगदीप ने सॉफ्टवेअर के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित कर दिया और उनके हिंदी इंटरनेट एक्सप्लोरर को तमाम जानकारों ने सराहा लेकिन सरकारों और सरकारी अफसरों ने दो साल से जगदीप को हैरान कर रखा है। सरकार खुद जिस काम के लिए करोड़ों रुपए खर्च कर रही है, वही काम एक शख्स ने अपनी लगन से अपने ही स्तर पर कर डाला है लेकिन फिर भी उसे न तो कोई तरजीह दी जा रही है और न ही इस महत्वपूर्ण कार्य का कोई मूल्यांकन। एक अनोखी प्रतिभा का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पा रहा।
हिंदीभाषियों की उस सोच का नमूना देखिए जो हिंदी की दुश्मन है। ग्वालियर में हिंदी और देवनागरी की सेवा करने वाली संस्था कर्मण्य तपोभूमि सेवा न्यास के संचालक आरएन मेहरोत्रा ने इस महत्वपूर्ण काम को विश्व स्तर पर लाने के लिए फिलहाल आईआईआईटीएम ग्वालियर में सेवारत जगदीप को विश्व हिंदी सम्मेलन में ले जाने के लिए काफी प्रयास किए लेकिन ऐन वक्त पर जगदीप के विभाग ने ही कागजी कार्रवाई में समय नष्ट कर दिया और एनओसी न मिल पाने के कारण वे वीजा न मिल पाने से न्यूयॉर्क नहीं जा सके। व्यक्तिगत स्तर पर आरएन मेहरोत्रा ने जगदीप के कार्य से संबंधित पैम्पलेट्स वहां जरूर बांटे जबकि होना तो यह चाहिए था कि सरकार की तरफ से इस दिशा में पहल होती और जगदीप को दुनिया के सामने हिंदी और भारत की नाक ऊंची करने का मौका मिलता।
मेहरोत्रा का कहना है कि जगदीप के काम का सही मूल्यांकन किए जाने और आर्थिक मदद की जरूरत है। अगर अन्य राज्य सरकारें इस पर विचार करें तो जगदीप अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के भी इसी तरह के उपयोग सॉफ्टवेअर तैयार करने की क्षमता और प्रतिभा रखते हैं।
बहरहाल, जगदीप की सफलता और सरकार के साथ ही कई हिंदीभाषियों की असफलता की यह कहानी साबित करती है कि हमारे देश में कई लोग अपनी भाषा को न तो अपनी अस्मिता का जरूरी हिस्सा समझते हैं और न ही उसके विकास या गौरव के प्रति सचेत हैं। इस सोच को बदलने के लिए इकाई के स्तर से शुरुआत की जाए तो शायद हिंदी या किसी और क्षेत्रीय भाषा से जुड़ा कोई आदमी हीनभावना का शिकार नहीं होगा और अपनी प्रतिभा को देशहित में लगा पाएगा।