आलेख:
इंसान को ‘अशरफुल-मखलूक’ अर्थात संसार के सभी जीवों में सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। इंसान की इसी श्रेष्ठता को बरकरार रखने और इसमें इजाफे के लिए अल्लाह का बेशकीमती तोहफा रमजान माह शुरू हो रहा है। रमजान महीने के दौरान दुनियाभर के मुसलमान रोजे अर्थात उपवास रखते हैं।
सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त के समय तक कोई भी चीज खाई या पी नहीं जाती और महीनेभर विशेष इबादतें की जाती हैं। रोजा इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है। सात साल की उम्र के बाद हर मुसलमान के लिए रोजा रखना फर्ज है। अरबी भाषा में रमजान का अर्थ है झुलसा देना। रोजे इंसान के जीवन को तपाकर कुंदन बना देते हैं।
दुनिया के हर मजहब में किसी न किसी रूप में उपवास अनिवार्य बनाए गए हैं। उपवास से मानव का शरीर व हृदय निर्मल और पवित्र हो जाता है। उपवास या रोजे से इंसान को असीम आत्मिक बल मिलता है। रोजा आत्मसंयम का एक बेमिसाल और रूहानी अभ्यास है। और आत्मसंयम जीवन के लक्ष्यों को हासिल करने का महान साधन। सब्र रोजे का दूसरा नाम है। रोजा इंसान को भूख-प्यास की शिद्दत पर सब्र करना सिखाता है।
अल्लाह के हुक्म और उसके रसूल पैगंबर मोहम्मद (सअस) की शिक्षाओं के मुताबिक इंसान जब रोजा रखता है तो उसे परवर दिगार ने जो खाने-पीने की नैमतें अता की हैं उनका महत्व मालूम पड़ता है और भूख-प्यास का मतलब भी समझ में आता है। इससे उसके दिल में उपजता है यतीम, गरीब, बेसहारा और लाचार लोगों की मदद का जज्बा।
रमजान के माध्यम से ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ के सिद्धांत को समाज में लागू किया गया। अपनी हैसियत के मुताबिक ‘जकात’ के जरिये गरीब तबके की मूलभूत जरूरतों की पूर्ति के लिए मदद करना अनिवार्य किया गया। कमजोर वर्ग की मदद किए बिना रोजे का कोई औचित्य नहीं रखा गया है।
समृद्ध वर्ग अपनी आय का कम से कम ढाई फीसदी समाज के कमजोर लोगों में तकसीम करता है। इस तरह समाज में परस्पर भाईचारे और मानवीय संवेदनाओं का ताना-बाना विकसित होता है। रोजों के रूप में एक महीने के सख्त इम्तेहान के बाद अगले ग्यारह माह तक रोजदार हिफाजत करता है अपने नैतिक, सामाजिक और मानवीय मूल्यों, कर्तव्यों और प्रतिमानों की।
रोजा सिर्फ भूखे और प्यासे रहने का ही नाम नहीं है। रोजे की कबूलियत की बुनियाद में पाकीजगी को रख दिया गया जिसमें जिस्मानी पाकीजगी के साथ विचारों व कर्मो की पवित्रता को भी अनिवार्य किया गया है। रोजे के दौरान बुरी बात सुनने, बोलने व देखने से भी परहेज करना होता है।
रोजदार तमाम तामसिक प्रवृत्तियों से दूर होकर ईश्वर के करीब हो जाता है। हर दिन अदा की जाने वाली पांच वक्त की नमाज के अलावा इस माह में तरावीह की विशेष नमाज पढ़ी जाती है। इस महीने की 27वीं रात को मुकद्दस रात माना जाता है। इबादत की इस महान रात को शबे कद्र कहते हैं। इस रात को की जाने वाली इबादत का दर्जा हजार रातों की इबादत के बराबर माना गया है।
तरावीह और शबेकद्र की पूरी रात की जाने वाली इबादत के दौरान कुरआन पढ़ा-सुना जाता है। कुरआन लोगों को ऐसी दृष्टि प्रदान करता है जो हर प्रकार के पक्षपात रहित समाज का निर्माण करे।
नैतिक दोषों को दूर कर सदाचार के गुणों का विकास करे, जो संक्षेप में इस प्रकार हैं- मां-बाप, रिश्तेदारों, यतीमों, मुसाफिरों, गरीबों के साथ अच्छा बरताव करो। अपने माल में से उनको दो। बुराई को भलाई से दूर करो, इससे शत्रुता खत्म हो जाती है। सब्र करना, अपराधी को क्षमा करना बड़े साहस का काम है। नाहक खून न बहाओ, लोगों को घरों से बेघर न करो।
कमजोर मर्दो, औरतों और बच्चों के लिए अत्याचारियों से लड़ो। नाजायज तरीके से दूसरों के माल को न खाओ। गुस्सा पी जाया करो, लोगों को क्षमा करो। वादा पूरा करो, समझौता करने के बाद उससे न फिरो। दूसरों के घरों में बिना आज्ञा न जाओ। मर्द, पराई औरत से और औरत, पराए मर्द से नजर बचा के रखे। बेहयाई से बचो, गंदी बातों के करीब न जाओ। संयम और पाकदामनी से रहो। अल्लाह के नेक बंदे अपनी बड़ाई पसंद नहीं करते, न धरती पर बिगाड़ पैदा करते हैं।
उपरोक्त कुरआनी शिक्षाओं को अपने दामन में समेटे प्रतिवर्ष रमजान का महीना यह उम्मीद लेकर आता है कि एहले इस्लाम और समस्त मानव जाति में अच्छाई के मामले में एक-दूसरे से आगे बढ़ने की प्रतिस्पर्धा पैदा हो। अच्छाई की इस प्रतिस्पर्धा से इंसान सही मायनों में खुद को ‘अशरफुल मखलूक’ साबित कर सके।