सम्पादकीय:
सेतु समुद्रम परियोजना के विरोध में विहिप की पहल पर हुए देशव्यापी चक्काजाम में बड़ी तादाद में भाजपा कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ने साफ कर दिया है कि भाजपा फिर जनभावनाओं की राजनीति पर अपने को केंद्रित करना चाहती है। राम सेतु निश्चित ही लोगों की भावनाओं से जुड़ा हुआ मुद्दा है।
आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) भले ही यह कहे कि रामायण एक मिथकीय कथा है, और इसके ऐतिहासिक कथा होने के कोई प्रमाण नहीं हैं, लोगों के लिए राम और उनसे जुड़ी हुई तमाम बातें सच हैं। आस्था कभी तर्को व प्रमाणों की मोहताज नहीं होती, भाजपा इस बात को समझती है।
आखिर यह सेतु समुद्रम परियोजना है क्या? दरअसल यह एक ऐसी परियोजना है जिसमें एक चैनल के जरिए बंगाल की खाड़ी से अरब सागर तक जहाजों के लिए सीधा रास्ता बनाया जाना है। अभी जहाजों को श्रीलंका का चक्कर काटकर जाना पड़ता है। दो हजार करोड़ से अधिक लागत की इस परियोजना के पूरी हो जाने से जहाजों को 400 समुद्री मील की यात्रा कम करनी पड़ेगी और लगभग 36 घंटे का समय बचेगा।
सरकार के मुताबिक इस परियोजना से दक्षिण भारत के समुद्री तटों का महत्व बढ़ जाएगा और वहां व्यापार बढ़ेगा। परियोजना में सबसे बड़ी बाधा भारत और श्रीलंका के बीच समुद्र में उभरा हुआ कुदरती ढांचा है। माना जाता है कि यह वही राम सेतु है जिसे भगवान राम ने लंका जाने के लिए नल, नील आदि वानरों की सहायता से बनवाया था। भाजपा और उसके सहयोगी इस सेतु को तोड़ने का विरोध कर रहे हैं।
एएसआई का कहना है कि इस सेतु के ऐतिहासिक व पुरातात्विक होने के कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं। मजे की बात यह है कि एएसआई ने बिना कोई सर्वे किए ही यह घोषणा कर दी है। सुप्रीम कोर्ट को दिए हलफनामे में एएसआई के निदेशक (स्मारक) सी दोरजी ने कहा है कि इस ब्रिज को लेकर कभी कोई ऐसे प्रमाण नहीं मिले जिससे एएसआई को इसका सर्वे करने की जरूरत महसूस हुई हो।
बिना किसी सर्वे के ऐसी बात कहकर एएसआई ने अपनी कार्यप्रणाली और जनभावना दोनों का मजाक उड़ाया है। अब अगर भाजपा इसका लाभ उठाना चाहती है, तो यह स्वाभाविक ही है। वैसे भाजपा को भी इसमें बहुत ज्यादा फायदा मिलने वाला नहीं है। राममंदिर के मुद्दे में तो राम बनाम बाबर का द्वंद्व था।
उस द्वंद्व में इतिहास की टीसें भी थीं, जो प्रतिशोध का भाव पैदा करती थीं, लेकिन राम सेतु के मामले में ऐसा कोई ‘बनाम’ नहीं है जिसके नाम पर लोगों को उद्वेलित किया जा सके। भाजपा लाभ की स्थिति में नहीं है, इसलिए सरकार को मनमानी की छूट नहीं मिल जाती। जनभावना से जुड़े हुए मुद्दों का सागर आम सहमति का सेतु बनाकर ही पार करना चाहिए।