दृष्टिकोण:
पाकिस्तान के इतिहास में वर्ष 2007 की 10 सितंबर की तारीख एक ऐसे विचित्र ड्रामे के लिए याद की जाएगी, जिसमें वहां की फौजी हुकूमत ने देश के सर्वोच्च न्यायालय को ठेंगा दिखाते हुए अपने ही पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को एक बार फिर जबरिया देश निकाला दे दिया। पाकिस्तान की सरकार ने शरीफ के दुबारा निर्वासन के लिए जो कारण बताए, शायद ही उन पर कोई यकीन कर सके।
पाकिस्तान के कानून मंत्री का कहना है कि नवाज शरीफ जैसे ही पाकिस्तान पहुंचे, उन्हें भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार करने के लिए वारंट थमा दिया गया। उनके सामने दो विकल्प रखे गए कि या तो वे जेल जाने के लिए तैयार हो जाएं या फिर देश से निर्वासित होकर सऊदी अरब में रहने के लिए। कानून मंत्री का दावा है कि शरीफ ने इन विकल्पों में निर्वासन को ही चुना।
बहरहाल, यह तो स्पष्ट है कि शरीफ को गिरफ्तार करने का ड्रामा उन्हें मीडियाकर्मियों और समर्थकों से दूर रखने के लिए रचा गया। नवाज शरीफ ने इस पूरे ड्रामे की असलियत बयान करते हुए अपनी पत्नी कुलसूम से कहा कि मुझे बताया गया था कि वे मुझे कराची ले जा रहे हैं, लेकिन पहुंचा दिया जेद्दा। इस समूचे घटनाक्रम से तमतमाई कुलसूम नवाज ने कहा, ‘मैं कुछ ही दिनों में पाकिस्तान लौटूंगी, तब देखूंगी कि मुझे कौन रोकने की हिमाकत करता है।’
नवाज शरीफ का पुन: निर्वासन जनरल मुशर्रफ के सोचे-समझे गणित के तहत किया गया। जाहिर है कि उनके इस कदम पर अमेरिका की पूर्ण सहमति और सऊदी अरब की मिलीभगत थी। सऊदी अरब भी पाकिस्तान की तरह आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में अमेरिका का सहयोगी है। सऊदी अरब के खुफिया प्रमुख प्रिंस मुकरिन बिन अब्दुल अजीज और जनरल परवेज मुशर्रफ के बीच नवाज शरीफ के पाकिस्तान आने के पहले ही बातचीत हुई थी।
इसके बाद शरीफ को यह चेतावनी दी गई थी कि वे सऊदी अरब प्रमुख को दिए गए इस वचन को निभाएं कि 2010 तक पाकिस्तान नहीं लौटेंगे। यह सब कुछ अमेरिका के सहायक विदेश सचिव रिचर्ड बाउचर के इस्लामाबाद में प्रवास के दौरान हुआ और दूसरे दिन ही अमेरिका के पूर्व खुफिया प्रमुख जॉन नेग्रोपोंटे भी पाकिस्तान पहुंच गए।
महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने इस कदम से मुशर्रफ ने यह जता दिया कि वे सुप्रीम कोर्ट या चीफ जस्टिस इफ्तिखार मोहम्मद चौधरी की कोई परवाह नहीं करते। और यदि उन्हें अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए जरूरत पड़ी, तो मार्शल लॉ लागू करने से भी नहीं हिचकेंगे।
सियासत की यह उठापटक ऐसे समय पर हुई जब पाकिस्तान में जनअसंतोष चरम पर है। इससे पहले मुशर्रफ के निर्देश पर उनकी फौज ने लाल मस्जिद में कार्रवाई करके सैकड़ों धार्मिक कट्टरपंथियों समेत मस्जिद में तालीम ले रही ऐसी कई छात्राओं को मौत के घाट उतार दिया, जो सीमांत क्षेत्र के आदिवासी इलाके से ताल्लुक रखती थीं।
लाल मस्जिद प्रकरण के बाद से तालिबान समर्थक चरमपंथी सेना और सैन्य चौकियों पर आत्मघाती हमले लगातार जारी रखे हुए हैं। इससे बुरा और क्या हो सकता है कि पिछले हफ्ते ही 300 पाकिस्तानी सैनिकों ने बिना किसी खास प्रतिरोध के आदिवासी क्षेत्र के चरमपंथियों के सामने समर्पण कर दिया। पाकिस्तान की सेना में बड़ी संख्या में ऐसे अधिकारी और सैनिक हैं, जो अमेरिका विरोधी तालिबान समर्थकों पर कार्रवाई के पक्ष में नहीं हैं।
आज मुशर्रफ के सामने राजनीतिक चुनौतियों से ज्यादा गंभीर चुनौती पाकिस्तान के सीमांत इलाके में हो रहे तालिबानीकरण की है। यहां स्थिति यह है कि बालिकाएं स्कूल नहीं जा सकतीं, नाई की दुकानें और वीडियो-पार्लर जबरिया बंद करा दिए गए हैं। पाकिस्तान में आधुनिकता की बयार लाने का दावा करने वाले मुशर्रफ की हुकूमत की परवाह किए बगैर कट्टरपंथियों का असर दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है।
राजनीतिक रूप से मुशर्रफ का सौदा भी बेनजीर भुट्टो के साथ नहीं पट पा रहा है। बेनजीर भुट्टो भी पाकिस्तान लौटना खतरे से खाली नहीं मानती हैं। अमेरिका और ब्रिटेन पिछले कई दिनों से बेनजीर भुट्टो और परवेज मुशर्रफ के बीच समझौता करवाने में बिचौलिये की भूमिका निभा रहे हैं। ये चाहते हैं कि किसी तरह इन दोनों के बीच समझौता हो जाए जिससे आने वाले चुनाव को कुछ विश्वसनीयता का पुट मिल जाए। लेकिन पाकिस्तान में अमेरिका को लेकर जिस तरह जनअसंतोष और रोष का वातावरण बना है उसके चलते पाकिस्तान की राजनीति में अमेरिका जितना ज्यादा दखल देगा, नवाज शरीफ की लोकप्रियता उतनी ही बढ़ती जाएगी।
नवाज शरीफ की वतन वापसी और फिर उनके साथ किए गए सुलूक और वापस सऊदी अरब भेज दिए जाने के घटनाक्रम से शरीफ के गृहक्षेत्र पंजाब में उनकी लोकप्रियता और तेजी से बढ़ने लगी है। पंजाब क्षेत्र से साठ प्रतिशत प्रतिनिधि चुनकर संसद पहुंचते हैं। पाकिस्तान के इन हालात को देखते हुए भारत की बुद्धिमानी इसी में है कि वह पाकिस्तान के अंदरूनी घटनाक्रम पर कोई टिप्पणी करने से परहेज ही बरते।
इसका परिणाम यह होगा कि पाकिस्तान में अमेरिका और सऊदी अरब विरोधी भावना तो जोर पकड़ेगी, लेकिन भारत इस पचड़े से बचा रहेगा। चाहे कोई भी शासक रहा हो, भारत के साथ दुश्मनी पाकिस्तान का स्थाई भाव है। भारत के खिलाफ अलगाववादियों व आतंकवादियों को उकसाने में नवाज शरीफ की भूमिका कम नहीं रही है।
यह नहीं भूलना चाहिए कि नवाज शरीफ ने व्यक्तिगत तौर पर आईएसआई के खुफिया प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल जावेद नसीर को 1993 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट का ताना-बाना बुनने के लिए अधिकृत किया था। फरवरी 1999 में जब अटल बिहारी वाजपेयी की लाहौर यात्रा हुई थी, उन्हीं दिनों नवाज शरीफ खालिस्तान की मांग करने वालों की मेहमाननवाजी कर रहे थे।
पाकिस्तान में शासक चाहे कोई भी हो, लेकिन जब मामला भारत का होता है तो सभी की भावनाएं भारत विरोधी ही होती हैं। भारत, पाकिस्तान के साथ जमीनी हकीकत को ध्यान में रखते हुए ही अपने रिश्तों को निर्धारित करे।
लेखक पाकिस्तान में भारत के उच्चयुक्त रहे हैं।