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यही हाल रहा तो दशहरा-दीवाली पर होगा स्टे

विशेष संपादकीय
राम और रामायण के अस्तित्व को ही नकार चुकी कांग्रेस सरकार किस कदर सकते में है, यह गुरुवार को पूरक शपथ पत्र दाखिल करने के फैसले के बाद टीवी पर दिखे वरिष्ठ मंत्रियों के बुझे चेहरों और चुप्पी से पता चलता है। देश की पौराणिक और ऐतिहासिक संस्कृति का अपमान करने वाले इन बिंदुओं को शपथ पत्र से तो हटाया जा सकता है, लेकिन करोड़ों भारतीयों के मानस पटल से हटाने की कोई 'पूरक' व्यवस्था मौजूद नहीं है।

जनता द्वारा निर्वाचित एक सरकार का शपथपूर्वक यह कहना कि न राम कभी हुए, न लंका गए, उस देश में बड़े डर पैदा कर देता है जहां की हर पीढ़ी बाल-कांड और सुंदर-कांड पढ़कर बड़ी हुई है। ये डर वे नहीं हैं जो 'अयोध्या कांड' कर चुकी भाजपा गिनाने में जुटी है। बल्कि ये वास्तविक और कानूनी डर हैं। जैसे अब सरकार यह कह सकती है कि, चूंकि राम-रावण युद्ध हुआ ही नहीं था, तो दशहरा मनाने की इस देश को कोई आवश्यकता ही नहीं है। इसी तरह अदालतों में सरकारी वकील भारी-भरकम अंग्रेजी में बड़ी जिरह कर दीपावली मनाने पर भी स्टे ला सकते हैं और इन सबका आधार सेतु समुद्रम प्रोजेक्ट पर कांग्रेस-नेतृत्व वाली यूपीए सरकार का मूल शपथ पत्र ही होगा।

क्यों हुई ऐसी भयंकर भूल?मनमोहन सरकार चाहे जो स्पष्टीकरण जारी करे, लगता यही है कि यह सुप्त राजनीतिक नेतृत्व के कारण हुआ है। यानी न जाने किन अफसरों ने तयशुदा सरकारी शैली में राम के बारे में 'तथ्य जुटाएं, प्रमाण पेश करें' जैसी टीप लिख डाली होगी। पुरा सर्वेक्षण में रामचरित मानस पर खुदाई शुरू कर दी होगी और मर्यादा पुरुषोत्तम के न मिलने पर बना दिया होगा शपथ-पत्र। न कानून मंत्री को इसे पढ़ने का समय मिला होगा और न ही केन्द्रीय मंत्रिमंडल में यह बात आई होगी। आज भी सरकार का उद्देश्य अगर पवित्र है तो ऐसा दुस्साहस किन-किन लोगों ने किया, उनके नाम राष्ट्र के सामने उजागर करने का साहस कर।

शपथ पत्र से राम अब क्यों हटा रहे हैं? ऐसा नहीं है कि विरोधी दलों/संगठनों से डरकर सरकार झुकी है। भाजपा की तो उसे न परवाह है, न परवाह करने की आवश्यकता है। क्योंकि राम पर राजनीति करने को लेकर जनता इस पार्टी को रद्द कर चुकी है। लगता है कि सरकार को अपनी धृष्टता का पता लगते ही भारी झटका लगा। उसे तो डर उन करोड़ों हिन्दुओं का लगा जो धर्मनिरपेक्ष हैं और कांग्रेस को जिताते आए हैं। पूरक शपथ-पत्र में राम शब्द को हटाकर उसने सिर्फ 'डैमेज कंट्रोल' किया है। हां, कांग्रेस इस गंभीर संवेदना के क्षण में भी अपनी चारण-संस्कृति नहीं छोड़ पाई। बजाय कि सरकार खुद शपथ-पत्र में सुधार करती, यह काम उससे सोनिया गांधी के 'निर्देश' पर करवाया गया। फिर महिमामंडन भी किया गया कि वे (विदेशी मूल की होने के बावजूद) भगवान राम को कितना सम्मान देती हैं? यही नहीं इसे पार्टी का मास्टर स्ट्रोक भी बताया जा रहा है।

क्या लाभ भाजपा को मिलेगा? जैसे ही शपथ पत्र में सुधार की घोषणा हुई, भाजपा में भारी हलचल मच गई। लालकृष्ण आडवाणी ने आनन-फानन में संवाददाता सम्मेलन बुलवा लिया। देशभर में रामकथा सुनाने की भगवा दौड़ टीवी पर शुरू हो गई। लेकिन जनता भाजपा के इस तरह के प्रलापों से त्रस्त हो चुकी है। उसे पता है, यदि कांग्रेस शपथ-पत्र की दोषी है तो भाजपा मौकापरस्ती की अपराधी। यदि श्रीराम चुनाव जीतने में सहायक दिखते हैं तो भाजपा उनकी नाव पर सवार हो जाती है।

नहीं तो उसे भय/भूख/भ्रष्टाचार सताने लगते हैं। यही नहीं इसे मुद्दा बनाना भी भाजपा का आफ्टर थॉट ही है। क्योंकि तीन दिन से चल रहे इस क्रूर मजाक और उस पर उठे बवाल के दौरान वह चुप ही बैठी रही। ठीक कांग्रेस सरकार की तरह। दोनों ही पार्टियां दरअसल मार्केट रिएक्शन देखती रहीं। ..और जब समूचे राष्ट्र को आहत देखा तो तत्काल राम नाम जपने लगीं। जागरूक जनता दोनों पार्टियों को इस मुद्दे पर फूटी कौड़ी का भी लाभ उठाने नहीं देगी।





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