सम्पादकीय. कहते हैं कि सुबह का भूला शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते हैं, पर साथ ही एक सच यह भी है कि राजनीतिक पार्टियां अगर भूल से कोई गलत स्टैंड ले लेती हैं तो उस पर डटे रहने की पूरी कोशिश करती हैं। कई बार एक ही गलती इतनी भारी पड़ती है कि सत्ता तक हाथ से चली जाती है। इस लिहाज से कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने अपनी गलती को सुधारने में जिस तत्परता का परिचय दिया है, वह काबिले गौर है।
सेतुसमुद्रम मुद्दे पर आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया( एएसआई) का हलफनामा केंद्र सरकार को बहुत भारी पड़ने वाला था। जन-जन के मन में बसे राम के अस्तित्व को नकारने वाले इस हलफनामे के तूल पकड़ने पर यूपीए के दलों का राजनीतिक अस्तित्व खतरे में पड़ सकता था।
इस बात को कांग्रेस में सबसे पहले उन सोनिया गांधी ने भांपा, जिन पर विदेशी मूल का ठप्पा लगाकर यह कहा जाता है कि उन्हें भारतीय संस्कृति और परंपराओं की समझ नहीं है। माना जा रहा है कि सोनिया गांधी के दखल के बाद ही केंद्र सरकार ने एक पूरक हलफनामा दाखिल करके भूल सुधार करने का फैसला लिया।
राम सेतु कुदरती ढांचा है, या निर्मित किया गया है, इस ढांचे की उम्र क्या है, इन सवालों पर तो एएसआई को राय देने का अधिकार है लेकिन इस देश में जन-आस्था के सबसे बड़े प्रतीक राम के अस्तित्व को ही मिथकीय कह कर नकार देने का क्या परिणाम हो सकता है, इसका शायद उसे अंदाजा ही नहीं था। विश्व हिंदू परिषद द्वारा आयोजित देशव्यापी चक्काजाम से भी सरकार को मुद्दे की गंभीरता का पता नहीं चला।
वो तो भला हो कि समय रहते सोनिया को इस मसले की अहमियत का अंदाजा हो गया और उनके हस्तक्षेप से एक बड़े विवाद को टालने का इंतजाम कर लिया गया। सोनिया का रुख देखते ही कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज भी कहने लगे कि जैसे हिमालय हिमालय है, जैसे गंगा गंगा है, वैसे ही राम राम हैं। उनके अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है।
सवाल यह है कि जब राम के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है तब पहले हलफनामे में यह कहने की क्या जरूरत थी कि रामकथा के पात्रों का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। अब सरकार शुक्रवार को पूरक हलफनामा दाखिल कर पहले हलफनामे के अनुच्छेद 5, 6 और 20 को वापस लेने जा रही है। गनीमत है कि सुबह को भूली हुई सरकार शाम को घर लौट आई है।