हिंदी दिवस विशेष. इंटरनेट की वजह से कंप्यूटर एक मीडिया की तरह विकसित हुआ है। रीयल टाइम की अवधारणा इंटरनेट के संव्यवहार में ज्यादा कारगर हुई है। इधर, सूचना भरकर बटन दबाया, उधर आपके खाते में पैसे जमा हो गए, बटन दबाया और हवाई जहाज का टिकट ले लिया। रेल के टिकट का प्रिंट आउट आप घर बैठे ही निकाल सकते हैं। यह है रीयल टाइम का भौंचक्क कर देने वाला कमाल। इतना ही नहीं, इंटरनेट में भंडारण क्षमता के जुड़ जाने से सूचना और ज्ञान का नया स्रोत विश्व के सामने खुल गया।
भारत जैसे देश की दिक्कत यह बनी हुई है कि इंटरनेट का प्रयोग अंग्रेजी के बिना कैसे किया जाए? ज्यादातर सामग्री अंग्रेजी में है। पूरे सिस्टम को भारतीय भाषाओं में बनाने की बात तो छोड़ दीजिए, क्योंकि उपभोक्ता का उससे सीधा संबंध नहीं है। इंटरफेस पर भारतीय भाषाएं हों, तो उपभोक्ता का काम चल जाता है।
हम लोग कामचलाऊ काम में ही विश्वास रखते हैं, इसलिए जिन कंपनियों ने इंटरनेट में प्रयुक्त होने वाली भारतीय भाषाओं के ‘डायनामिक फॉन्टों’ को विकसित किया, उनमें भी मानकीकरण की कमी वैसे ही बनी हुई है, जैसी सामान्य कंप्यूटर फॉन्टों में थी। अपने व्यावसायिक हितों की वजह से वे मानकीकरण नहीं चाहते। इसलिए जितना विस्तार इंटरनेट का होना चाहिए था, हो नहीं पाया।
आज हिंदी के लगभग सभी दैनिक समाचार पत्र इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। कई पत्रिकाएं भी हिंदी में हैं। इनमें कुछ साहित्यिक लघु पत्रिकाएं हैं, जैसे- हंस, तद्भव, वागर्थ, मधुमती, अन्यथा इत्यादि। कुछ इंटरनेट की ही पत्रिकाएं हैं, जैसे अभिव्यक्ति- अनुभूति, हिंदी नेस्ट, कृत्या आदि। अधिकतर पत्र-पत्रिकाओं के फॉन्ट अलग-अलग हैं।
यदि आपके कंप्यूटर में किसी साइट-विशेष में प्रयुक्त फॉन्ट न हो-तो आप उसे पीसी पर सेव नहीं कर सकते, बहुत बार प्रिंट भी नहीं ले पाते। इससे जानकारी का प्रयोग मनचाहे ढंग से नहीं हो पाता। इस समस्या का कुछ हद तक हल यूनिकोड पद्धति से भाषाओं या वर्णमाला की मैपिंग करने पर हो गया है। यह पद्धति धीरे-धीरे लोकप्रिय हो रही है। अब यूनिकोड सम्मत फॉन्ट वाली वेबसाइटें सहजता से उपलब्ध होने लग गई हैं। बहुत से ‘ब्लॉग’ हिंदी में हैं। यह सारा काम मंगल फॉन्ट में होता है। इस फॉन्ट में विविधता और सौंदर्य पैदा करने की जरूरत है।
अभी तक साहित्य आदि और समाचार तो हिंदी में मिल जाते हैं यानी मीडिया की भूमिका कुछ हद तक पूरी हो जाती है। लेकिन इंटरनेट का बड़ा क्षेत्र व्यवसाय में है। जैसे राजकमल प्रकाशन की वेबसाइट है। उनकी पुस्तकों की ऑनलाइन बिक्री तब तक सफल नहीं हो सकती, जब तक ग्राहक अपनी पसंद की पुस्तक को खोज न पाए और खरीद का आदेश न दे पाए।
खोज तभी संपूर्ण होगी जब ग्राहक हिंदी की पुस्तक को देवनागरी में टाइप कर पाएगा। यूं काम चलाऊ ढंग से रोमन में हिंदी टाइप कर ली जाती है, पर उसमें हिंदी के शब्दों की सही ध्वनि निकालना कठिन होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि अमेजॉन डॉट कॉम की पुस्तकों की बिक्री जिस पैमाने पर होती है, उस स्तर तक पहुंचने के लिए हिंदी भाषा को प्रौद्योगिकीय छलांगें लगातार लगाते रहना होगा। हम कामना कर सकते हैं कि हम देवनागरी में जानकारी भरें और रेल टिकट हमारे घर पर आ जाए।
असल में ग्राहक परमेश्वर होता है और व्यापारी ग्राहक की भाषा समझता है। भारत में उच्च शिक्षा, सफेद कॉलर नौकरी या व्यवसाय, सेवा संबंधी व्यवसाय अंग्रेजी के बिना नहीं चलते, बल्कि अंग्रेजी में ही चलते हैं। भारतीय भाषाएं निचले तबके, छोटे कारोबार और ग्राम्य समाज तक सीमित होती जा रही हैं। उदाहरण देकर बात की जाए तो जो व्यक्ति ऑनलाइन बैंकिंग करता है, वह अंग्रेजी का अभ्यस्त होता है।
अंग्रेजी रंग-ढंग को अपनाना अपनी शान समझता है और हिंदी से जुड़ना उसे हेय लगता है। अगर उत्तरप्रदेश या हरियाणा का कोई ठेठ किसान ऑनलाइन बैंकिंग का ग्राहक बनने के लिए आए और उसकी जेब भरी हुई हो तथा ऐसे लोग बहुतायत में हों, तो हिंदी में यह सुविधा उपलब्ध हो जाएगी।
मीडिया का उदाहरण प्रत्यक्ष प्रमाण की तरह है। चूंकि ज्यादातर जनता हिंदी समझती है इसलिए हिंदी के चैनल फल-फूल रहे हैं। अब इस सामाजिक-भाषायी ग्रंथि का क्या किया जाए। जब तक ये गांठें नहीं खुलेंगी, भाषा का प्रसार बाधित ही होता रहेगा।
यदि आज भी प्रयास शुरू कर दिए जाएं और स्कूलों में भारतीय भाषाओं में कंप्यूटर शिक्षा अनिवार्य कर दी जाए, तो प्रौद्योगिकी का विकास तो होगा ही, भविष्य के भारतीय भाषा के ग्राहक भी हमें मिल सकेंगे। बाजार अपने आप विकसित होगा, लेकिन सरकार को भी इस मामले में जागरूक रहकर नीति बनाने और उसे लागू करने का काम करना होगा।
-लेखक ख्यात साहित्यकार एवं स्तंभकार हैं।