जालंधर:
मेयर की कुर्सी पर बैठते ही राकेश राठौर की राजनीति में नई पारी की शुरूआत हो जाएगी। पहले चुनावी शोर और फिर एक महीने से ज्यादा समय तक मेयर का ऐलान नहीं होने शहर में विकास कार्य एक तरह से रुक ही गए थे। अब नए योद्धाओं के लिए चुनौतियों का सफर शुरू हो गया है। सबसे बड़ी चुनौती खस्ताहाल सड़कें हैं। ऊबड़-खाबड़ सड़कों पर हर साल 9 करोड़ रुपए खर्च कया जा रहा है, बावजूद सड़कों से गड्ढे खत्म होने का नाम नहीं लेते।
पेयजल और सीवरेज व्यवस्था मुहैया करवाना
शहर के सभी हिस्सों में अभी तक सौ फीसदी लोगों को पेयजल और सीवरेज नहीं उपलब्ध करवाया जा सका है। निगम के आंकड़ें बताते हैं कि अभी तक 85 फीसदी लोगों को पेयजल और 63 फीसदी को लोगों को सीवरेज व्यवस्था मिल सकी है। 15 फीसदी को लोगों को पेयजल व 37 फीसदी लोगों को सीवरेज मुहैया करवाने के लिए नगर निगम के साथ-साथ मेयर के लिए बड़ी मुसीबत साबित होगी।
सड़कों पर बहता है सीवरज का पानी
सीवरेज समस्या से परेशान शहरवासी की परेशानी मेयर की दूसरी सबसे बड़ी परेशानी साबित होगी। प्राथमिकता के तौर पर सीवरेज समस्या को हल करने के लिए अगर कोई ठोस उपाय नहीं किए गए तो आने वाले दिनों में मेयर के खिलाफ जनता लामबंद होगी। हर साल 2 करोड़ रुपए खर्च होने के बावजूद सीवरेज समस्या बरकार है।
गंदगी के ढेर में साफ है शहर
राकेश राठौर के लिए शहर को स्वच्छ बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ेगा। शहर के अलग-अलग इलाकों में कूड़े के डंप लगे रहते हैं, लेकिन उसे उठाने वाला कोई नहीं। हालांकि शहर की सफाई के लिए 200 सफाई कर्मचारी काम कर रहे हैं।
ग्रीन एंड क्लीन सिटी बनाने के लिए
शहर को ग्रीन एंड क्लीन बनाने के लिए मेयर राकेश राठौर को निगम अधिकारियों को जवाबदेही बनाना होगा। इसके लिए शहर में ग्रीन बैल्ट पर लोगों का कब्जा हटवाना मेयर के लिए मुश्किलों वाला सफर होगा।
कहां है प्लानिंग, क्यों हो रहा अवैध निर्माण
शहर के प्लानिंग के लिए नगर निगम के अधिकारी गंभीर नहीं है, नतीजन शहर में अवैध निर्माण बढ़ गए हैं। जिससे शहर बेतरतीब ढंग से बसता जा रहा है। इसे र्ढे पर लाने के लिए मेयर को प्रापर्टी डीलर्स एवं कालोनाइजर्स से सीधी जंग लड़नी होगी।
ट्रैफिक समस्या और अतिक्रमण
अतिक्रमण पर डंडा चलाने के लिए मेयर को गंभीर होना पड़ेगा। क्योंकि अतिक्रमण ने शहर की हालात को बदतर बना दिया है। अतिक्रमण के कारण ट्रैफिक समस्या शहरवासियों की सबसे बड़ी परेशानी बन गई हैं। पुरानी जीटी रोड पर कंपनी बाग चौक से लेकर पटेल चौक की मात्र 2 किी की दूरी 2 घंटे में पूरी हो सकती है।
अनसेफ बिल्डिंग से अनसेफ शहर
मेयर राकेश राठौर के लिए अनसेफ इमारतें चुनौती पैदा कर सकती हैंष शहर में लगभग 100 से ज्यादा जर्जर इमारतें कभी भी बड़े हादसे का कारण बन सकती हैं। आजादी से पहले बनी इन इमारतों का गिरना जारी है। रेलवे रोड से लेकर चरणजीत पुरा के बीच लगभग एक सौ से ज्यादा प्राचीन इमारतें गिरने की हालत में हैं। निगम द्वारा साल 2005 के सर्वे में पुराने शहर में 63 इमारतों को अनसेफ घोषित किया गया है। जिसमें से 18 इमारतें अत्यंत जर्जर हैं। निगम ने नोटिस देकर पल्ला झाड़ लिया।
निगम के स्कूलों की खस्ताहाल स्थिति
शहर के अलग-अलग इलाकों में स्थित 17 सरकारी प्राइमरी स्कूलों के भवनों की हालत खस्ताहाल है। नगर निगम ने इन स्कूलों में ईटीटी टीचरों की भर्ती तो कर दी है, लेकिन भवनों की हालत दयनीय है।
बीमार हैं हैल्थ डिस्पैंसरियां
नगर निगम की 14 हैल्थ डिस्पैंसरियां और 3 मदर चाइल्ड हैल्थ सैंटर बीमार पड़े हैं। इनमें से कुछ सोसायटियों की तरफ से चलाए जा रहे हैं, जहां डाक्टर ड्यूटी देते हैं। कई डिस्पैंसरियों की इमारत तक नहीं हैं, भगवान भरोसे चल रहीं इन डिस्पैंसियों में हर साल लाखों रुपए की दवाई खर्च हो जाती है।
मेयर बनाएं मास्टर प्लान
मेयर राकेश राठौर के लिए शहर के मास्टर प्लान बनाने की अहम जिम्मेदारी होगी। पिछले एक साल से मास्टर प्लान नहीं बन सका है। मास्टर प्लान के तहत शहर को विकसित करने के लिए खाका खींचा जाना है, जिससे आधुनिक शहर की परिकल्पना बनाई जा सके।