bhaskar Web English
HomeVichaar Vichaar

फिल्मों ने लहराया राष्ट्रभाषा का परचम

हिंदी दिवस विशेष. भारत में सिनेमा का जन्म और विकास गैर हिंदी भाषी लोगों ने किया है, परंतु बॉक्स ऑफिस के सूत्र हमेशा हिंदी भाषी दर्शकों के हाथ रहे हैं और इस ऊपरी विरोधाभास का तनाव फिल्मों की गुणवत्ता पर हमेशा बना रहा है। इस अजब-गजब भारत ने टेक्नोलॉजी और विज्ञान से जन्मे इस जादुई माध्यम को शीघ्र ही आत्मसात कर लिया, क्योंकि कथा कहने का माध्यम कथावाचकों और श्रोताओं के देश को अपना-अपना सा लगा।

प्रारंभिक दौर में धार्मिक आख्यानों पर ही फिल्में बनीं क्योंकि माध्यम के वैज्ञानिक अध्ययन के अभाव में दर्शकों की परिचित कथा होने के कारण अन अभिव्यक्त हिस्से की फिक्र नहीं करनी पड़ी। लिफाफा देखकर मजमून भांपने की विधा में प्रवीण होते गए दर्शक आज पंद्रह सैकंड के प्रोमो को देखकर निश्चय कर लेते हैं कि उन्हें क्या देखना है और क्या नहीं देखना है। सिनेमा के जन्म से लेकर आज तक फिल्मकारों और दर्शकों ने बिना किसी पाठशाला में जाए ही इस माध्यम को समझा है।

इस माध्यम की सारी पाठ्यपुस्तकें अंग्रेजी भाषा में लिखी हैं और माध्यम के मोह से बंधकर देश के कोने-कोने से लोग मुंबई आकर इस माध्यम से जुड़े। अत: कॉमन होने के कारण पटकथाएं अंग्रेजी में लिखी जाती रही हैं ताकि दक्षिण और पूर्व से आए गैर हिंदी कलाकार और तकनीशियन के बीच संवाद स्थापित हो सके और आज भी हिंदी में बनाई जाने वाली सारी फिल्मों की पटकथा अंग्रेजी में लिखी होती है और सैट्स पर भी अंग्रेजी ही बोली जाती है।

इस तथ्य के बावजूद मुंबइया सिनेमा ने हिंदी की बहुत सेवा की है और हिंदी दर्शक की विराट संख्या को सभी लोग समझते भी हैं और बॉक्स ऑफिस की ताकत का आदर करना फिल्म वालों को घुट्टी के साथ पिलाया जाता है। इस अंग्रेजी की अनिवार्यता के कारण ही भारतीय सिनेमा में कथा और पटकथा के साथ संवाद लेखक का पद भी होता है, जबकि दुनिया के किसी भी फिल्म बनाने वाले देश ने संवाद और पटकथा को अलग नहीं समझा है।

जिस कालखंड में राजनीतिक कारणों से दक्षिण में हिंदी का विरोध हो रहा था, उसी कालखंड में दक्षिण के असंख्य लोगों ने हिंदी सीखी, क्योंकि इसी कालखंड में मुंबइया फिल्म उद्योग में अजर-अमर गीत-संगीत रचा जा रहा था। उस कालखंड में अद्भुत प्रतिभाशाली लोग फिल्मी गीत-संगीत रच रहे थे। मुसलमान मोहम्म्द रफी ध्यान में लीन होकर भजन गा रहे थे, जिसे नौशाद ने रचा और शकील साहिर ने लिखा था और लता मंगेशकर का तल्लफुज इतना साफ रहा कि उन्हें मीर गालिब की अदायगी अत्यंत विश्वसनीय रही।

खय्याम की धुनों पर आशा भोंसले ने उमरावजान अदा में ऐसे गीत गाए हैं कि लगता है यह कोई लखनऊ या लाहौर में पैदा हुई और पढ़ी-लिखी महिला हैं। फिल्मी गीतों के कारण ही खाड़ी के देशों और यूरोप के तत्कालीन तमाम लाल देशों में अनेक लोगों ने हिंदी सीखी। आज हिंदी फिल्में दुनिया के अधिकांश देशों में सफलता से दिखाई जा रही हैं और लैटिन अमेरिका के दर्शक इन गीतों पर थिरकते हैं। दरअसल मनोरंजन उद्योग और सिनेमा स्वयं में एक भाषा है जिसका व्याकरण बॉक्स ऑफिस के खिड़की पर लिखा गया है।

हिंदी की बॉक्स ऑफिस ताकत के कारण ही हॉलीवुड वाले न केवल अपनी फिल्मों को हिंदी में डब कर रहे हैं, वरन हिंदी में फिल्मों का निर्माण भी कर रहे हैं। भंसाली की ‘सांवरिया’ और चोपड़ा की काटरून फिल्म में हॉलीवुड का धन लग रहा है। भाषाओं की लोकप्रियता का हमेशा आर्थिक आधार होता है। जब दरबार और अदालतों में उर्दू चलती थी, अनेक हिंदुओं ने भी उर्दू सीखी थी।

इसी तरह अंग्रेजों की सत्ता के दिनों में हमने अंग्रेजी सीखी, जिसके कारण आज टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में हिंदुस्तानी डॉलर कूट रहे हैं। आज अनेक चीनी लोग हिंदी सीख रहे हैं, क्योंकि भारतीय बाजार में उन्हें जमना है। भारत की संपदा ने किसी दौर में लोभी विदेशियों को आकर्षित किया था। हमने अपनी महत्वपूर्ण संपदा हिंदी के साथ हमेशा सौतेला व्यवहार किया, परंतु आज बाजार की ताकत के कारण विदेशी इस भाषा संपदा की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

हिंदी दर्शक ने तो कमाल दिखाया है, परंतु हिंदी पाठक की उदासीनता के कारण हिंदी को बहुत क्षति पहुंची है। किताब खरीदने वालों की संख्या सिमट गई है और पूरा प्रकाशन उद्योग सरकारी वाचनालय की खरीदी पर आधारित है। भारत के अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले फिल्मकारों ने हिंदी सीखी। मुंशी प्रेमचंद की ‘शतरंज के खिलाड़ी’ को अनुवाद में पढ़कर सत्यजीत राय ने इस पर फिल्म बनाने के लिए हिंदी सीखी।

कुछ सितारों की लोकप्रियता के कारण अनेक गैर हिंदीभाषी दर्शकों ने हिंदी सीखी है और अगर गुरु नहीं मिला, तब भी बार-बार फिल्म देखकर दृश्य के आधार पर संवाद का अर्थ निकाल लिया गोया कि सिनेमाघर हिंदी की पाठशाला भी रहा है। आजकल छोटे परदे पर प्रसारित एक कार्यक्रम में एक चीनी और नेपाली ने हिंदी के गीत गाए हैं।

यह सचमुच अजीब बात है कि मुंबइया उद्योग में कार्य करने की भाषा अंग्रेजी है, परंतु फिल्मों के कारण अनेक लोगों ने हिंदी सीखी है। अब हिंदी का पाठक भी अगर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करे, तो भाषा का भला हो सकता है। मराठी और बंग्ला में हिंदी से अधिक किताबें बिकती हैं, क्योंकि सुधि पाठक घर का आवश्यक सामान खरीदते समय किताबें भी खरीदता है।

-लेखक प्रख्यात फिल्म समीक्षक हैं। राजकपूर की सृजन प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण पुस्तक के अलावा इन्होंने कई पटकथाएं एवं उपन्यास भी लिखे हैं।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: