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वचरुअल भाषा बनकर न रह जाए हिंदी

हिंदी दिवस विशेष. पिछले दिनों न्यूयार्क में हुए हिंदी सम्मेलन में बड़ी उम्मीदें जगाई गई हैं कि हिंदी अब संयुक्त राष्ट्र की भी आधिकारिक भाषा बन जाएगी - सूची में पांचवीं के बाद छठी भाषा। परमाणु शक्ति और विश्व बाजार में अपनी पैठ के बाद भारत की इस भाषा को कुछ वर्षो में यह पद मिल जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। वैसे भी जब दुनिया की स्पेनी और फ्रांसीसी जैसी बहुत कम आबादी से जुड़ी भाषाओं को, अगर शुरू से ही यह गौरव प्राप्त है तो हिंदी ही वंचित क्यों रहे?

कहा जाता है कि हिंदी भाषा से जुड़े लोगों की तादाद दुनिया में दूसरे या तीसरे नंबर पर है। शायद इसलिए अपने राष्ट्र से निष्कासित होकर यह भाषा अंतरराष्ट्रीय होने जा रही है। हिंदी में बिकने वाली पत्र-पत्रिकाओं की संख्या और विज्ञापनों में रोमनलिपि में लिखे कुछेक हिंदी शब्दों को देखकर शायद हमें यह भ्रम होने लगता है कि हिंदी का प्रसार-प्रचार बढ़ रहा है। अच्छा होता कि हम इस भ्रम को समझते और उस पर विचार करते।

पिछले दिनों वर्धा के हिंदी विश्वविद्यालय के बारे में जो खबरें छपीं, उनमें एक यह भी है कि सलाहकार मंडल या ऐसे ही किसी निर्णायक मंडल को विचार के लिए जो सामग्री भेजी गई, वह पूरी की पूरी अंग्रेजी में थी। गुजरात से पिछले कुछ महीने पूर्व यह खबर आई कि सरकार बच्चों को पैदा होते ही अंग्रेजी सिखाने का विशेष अभियान चलाएगी। इस अभियान के क्रियान्वयन के लिए शायद सैकड़ों-करोड़ों रुपयों का प्रावधान हुआ है।

इस चमत्कारी कदम की सराहना करते हुए हिंदी के ही बहुत बड़े अखबार ने अपने संपादकीय में उन तमाम हिंदी भाषी प्रदेशों को नसीहत भी दे डाली कि ये राज्य (हिंदी भाषी) किस अंधकार युग में जी रहे हैं - अंग्रेजी के वगैर। वैसे भी अनेक हिंदी भाषी राज्यों में गैर सरकारी ही नहीं, बल्कि सरकारी स्कूलों में भी पहली कक्षा से अंग्रेजी पढ़ाने की मुहिम छिड़ चुकी है।

और यह तो हमें हमेशा याद रहता ही है कि राष्ट्रभाषा होते हुए भी सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की भाषा हिंदी नहीं, अंग्रेजी है। प्रशासन, सेना, पुलिस इत्यादि-इत्यादि किसी भी विभाग की भाषा हिंदी नहीं है। अगर उन हलकों में हिंदी सुनाई पड़ जाती है तो कुछ वैसी ही जैसी कि अंग्रेज बहादुरों के समय हुआ करती थी, जिसे सब बटलरी हिंदी कहा करते थे।

इधर हिंदी जो अपना नया रूप अख्तियार कर चुकी है, उस पर भी काफी विचार-विमर्श और बहस-मुहावसे के बाद शायद आधे से ज्यादा विद्वानों ने यह मान लिया है कि बटलरी हिंदी का नया संस्करण हिंग्लिश या हिंग्रेजी जायज है और मुनासिब भी। उच्च शिक्षा से निष्कासित हिंदी की, अब प्राथमिक और पूर्व प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर भी जड़े काटी जा रही हैं। अब हम सब लोग डैडी, पापा, मम्मा, कजिन वगैरा हो गए हैं।

हमारे दिनों के नाम ‘मंडे’ से शुरू होते हैं। हमारे रंग पिंक और ब्लैक हैं। वैसे ही अंग्रेजी ही क्यों दुनिया की पचासों भाषाएं हमें सीखनी चाहिए और अंग्रेजी तो जरूरी ही सीखनी चाहिए, क्योंकि अब हर तरह की नौकरी, व्यवसाय, सम्प्रेषण इत्यादि-इत्यादि की भाषा दुनिया भर में अंग्रेजी ही होती जा रही है, लेकिन हमारे यहां हो यह रहा है कि कम साधनों वाले बच्चे, अंग्रेजी के चक्कर में न तो अंग्रेजी सीख पाते हैं और न हिंदी।

रही बात हिंदी के अंतर्राष्ट्रीय होने की सो यहां भी हालत यह है कि दुनिया में शिक्षा और शोध संस्थानों में जितनी हिंदी २क् साल पहले हुआ करती थी, अब उसकी चौथाई भी नहीं रह गई है। हिंदी का पुरोहित वर्ग आंकड़े दे-देकर बताता है कि दुनिया के कितने विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा रही है।

अगर किसी देश में तीन-चार विद्यार्थी भी हिंदी में एम.ए. कर रहे हों तो उन्हें लगता है कि पूरे देश में हिंदी छा गई है। मगर हकीकत कुछ और है। चीन, सोवियत संध और पूर्वी यूरोप के देश एक जमाने में बड़े जोश से हिंदी सिखाते-सिखाते थे। वहां से हर साल दो सौ छात्र हिंदी स्नातक या उसके समकक्ष हो जाया करते थे।

यही नहीं कुछ देशों में बहुत बड़े-बड़े प्रकाशन गृह हिंदी में सैकड़ों पुस्तकें छापा करते थे, लेकिन विदेशों में आज हिंदी प्रकाशन का यह धंधा पूरी तरह चौपट हो चुका है। इससे हिंदी में अब विदेशों का वह श्रेष्ठ साहित्य भी पूरी तरह अनुलब्ध हो चुका है। मजेदार बात यह है कि अगर हिंदी का पुरोहित वर्ग चीनी भाषा के प्रचार-प्रसार पर नजर डालें तो दंग रह जाएगा। इसके लिए चीन को कोई ‘मंडारिन दिवस’ (चीनी दिवस) मनाने की या सप्ताह या पखवाड़े आयोजित करने की जरूरत नहीं पड़ती।

दुनिया भर के सरकारी, गैर सरकारी संस्थान या व्यापारिक संस्थान खुद पहल करके लाखों लोगों को चीनी भाषा सिखा रहे हैं। अलबत्ता चीन की सरकार खुद इंटरनेट, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और २00८ के ओलंपिक खेलों के लिए अंग्रेजीदां लोगों की पूरी पल्टन तैयार कर रही है - शायद २0-३0 लाख लोगों की पल्टन, जबकि चीन में अंग्रेजी सीखने की ललक शायद भारत से भी ज्यादा होगी।

‘मदर्स डे’, ‘फादर्स डे’ की तरह एक दिन ‘हिंदी दिवस’ मनाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेना एक बात है, शासन, प्रशासन, शिक्षा, व्यापार और जीवन के हर क्षेत्र में हिंदी को सचमुच आगे बढ़ाना एक-दूसरी बात, जो इतना आसान नहीं है। हम में से बहुत से लोग शायद यह साफ देख पा रहे हैं कि अब बहुत देर हो चुकी है। इंटरनेट पर हिंदी की वेबसाइट भले ही लाखों बन जाएं, उनसे हिंदी एक वर्चुअल भाषा ही बन सकेगी, रियल भाषा नहीं।

-लेखक सुपरिचित साहित्यकार हैं।





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