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दृष्टिकोण. देश में पिछले कुछ दिनों में हुई घटनाएं लॉर्ड वावेल के इस कथन को सत्यापित करती हैं कि ‘भारत में या तो दृढ़ता से शासन चलाया जा सकता है या फिर बिलकुल ही नहीं।’ हाल ही में बिहार में हुई घटनाएं जिनमें छोटे अपराधियों को भीड़ ने जिस तरह सजा दी और पुलिस ने बर्बर सुलूक किया, आगरा और हरियाणा में हिंसक भीड़ ने आगजनी की, हैदराबाद में आतंकवादी हमले किए, इन सबसे लगता है कि भारत में अराजकता का नया व्याकरण लिखा जा रहा है।
देश में अराजकता के वर्तमान परिदृश्य की रूपरेखा के बारे में कुछ विचार किया जाए, इससे पहले देश के आंतरिक हालात के तीन मापदंडों की ओर ध्यान आकर्षित करना जरूरी है। ये हैं, आंतरिक सुरक्षा, शांति-व्यवस्था और सामान्य कानून-व्यवस्था। सामान्यतौर पर हम इन तीनों को आपस में मिलाकर देखते हैं। इन तीनों स्थितियों की अलग-अलग पड़ताल करने की आवश्यकता है।
आतंकवाद और विध्वंसकारी वारदातों से जुड़ी सभी घटनाएं चाहे वे विदेशी ताकतों की मदद से रची गई हों या देश के भीतर के ही द्रोही तत्वों के साथ मिलकर इन साजिशों को अंजाम दिया गया हो, ये सब देश की एकता, अखंडता व आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौतियां हैं।
बड़े पैमाने पर हिंसा, चाहे वह सांप्रदायिक हो या फिर जातीय अथवा सामुदायिक, यह समाज की शांति व्यवस्था और सामाजिक समरसता के लिए खतरा खड़ी करती हैं। भीड़ या किसी समूह द्वारा कानून को अपने हाथ में ले लेना यह अलग मामला है।
पिछले कुछ दिनों से यह देखने को मिल रहा है कि उत्तेजित भीड़ अपने हाथों में ही कानून लेकर अपराधी को सरेआम सजा दे देती है। न तो आरोपी के अपराधों की जांच होती है और न ही उसे अपनी सफाई में कुछ कहने का मौका मिलता है। हाल ही में एक के बाद एक ऐसी तीन घटनाएं बिहार में हुईं। ऐसी घटनाओं का चलन बढ़ता ही जा रहा है।
चूंकि आमलोगों में यह धारणा बन चुकी है कि पुलिस की रुचि न तो अपराधियों को पकड़ने में रहती है और न ही उसे सजा दिलाने में। नतीजतन लोग अब आपराधिक वारदातों की रिपोर्ट लिखाने में दिलचस्पी ही नहीं लेते। और शायद उसी का परिणाम है कि सामूहिक रूप से कानून अपने हाथ में ले लेते हैं।
आंकड़े बताते हैं कि जो मामले पुलिस पंजीबद्ध भी करती है, उनमें से महज तीस प्रतिशत ही ट्रायल के लिए न्यायालय तक पहुंच पाते हैं। भारतीय दंड संहिता के तहत दर्ज मामलों में जहां 1961 में सजा का प्रतिशत 64 था, वहीं 2005 में यह आंकड़ा घटकर 42 प्रतिशत हो गया, जबकि इसी कालावधि में पुलिस अभिरक्षा में मरने वालों का आंकड़ा बढ़ गया।
1995 में पुलिस अभिरक्षा में जहां 207 लोगों की मौतें हुईं, वहीं 2002 में 1340 लोगों को लॉकअप में अपनी जान गंवानी पड़ी। आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार के लिए गठित समिति का मत ठीक ही है कि ‘आज हिंसा और संगठित अपराध दस्तूर सा बन गया है। सजा की गुंजाइश कम से कम होती जा रही है, ऐसे दौर में अपराध एक फायदेमंद धंधे में बदल गया है।’
भीड़ की लगातार होती हिंसक प्रवृत्ति भी समाज में शांति व्यवस्था को बनाए रखने के लिए आज गंभीर चुनौती है। किसी भी घटना-दुर्घटना की प्रतिक्रियास्वरूप हम देखते हैं कि भीड़ में शामिल लोग किस तरह कानून को अपने हाथों में ले लेते हैं।
चाहे पिछले महीने 29 अगस्त की आगरा की घटना को देखें या राजस्थान और हरियाणा में कावड़ियों की सड़क दुर्घटना, भीड़ ने सार्वजनिक संपत्ति को स्वाहा किया, पुलिस पर हमले किए। जो इससे पीड़ित थे उनके गुस्से को छोड़ भी दें, तो तमाशबीन और राहगीरों ने भी इस तोड़-फोड़ और विध्वंस में बढ़-चढ़कर भाग लिया।
ये घटनाएं बयान करती हैं कि हमारा समाज आज किस तरह संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। आम जीवन में अनुशासनहीनता और गैरजिम्मेदारी किस तरह बढ़ती जा रही है। जाति संप्रदाय और समूहों का नेतृत्व करने वाले गैर जिम्मेदार नेता कानून तोड़ने व इसकी धज्जियां बिखेरने के लिए हर वक्त तैयार दिखते हैं। किसी के आचरण में कानून के शासन के प्रति जरा भी सम्मान नजर नहीं आता।
अब जहां तक रही बात देश की आंतरिक सुरक्षा की, तो हाल ही में हैदराबाद में हुए धमाके बहुत ही भयावह तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। हैदराबाद में मई महीने में मक्का मस्जिद और पिछले महीने लुंबनी पार्क में हुए धमाके बताते हैं कि आतंकवादियों ने हमारे कानून व्यवस्था के ढांचे में किस तरह सेंध लगा रखी है। असम में विध्वंसकारी तत्व देश की अखंडता को लगातार चुनौतियां पेश ही करते जा रहे है।
कई इलाकों में नक्सलवादियों का खूनी खेल अलग चल रहा है। नक्सली अब गुरिल्ला फोर्स बनकर हमले कर रहे हैं। अकेले छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने वर्ष 2006 में 365 नागरिकों को मार डाला। वे भारत के हृदय क्षेत्र में अपना क्रांतिक्षेत्र कायम करना चाहते हैं। नक्सलियों के रेड कॉरिडोर का विस्तार अब शहरों की ओर होने लगा है।
वर्तमान में देश की आंतरिक सुरक्षा, समाज में शांति व्यवस्था और सामान्य कानून व्यवस्था की ऐसी चिंताजनक स्थिति यह दर्शाती है कि हमें अपने शासन और प्रशासन के तौर-तरीकों को अभी भी सीखने की जरूरत है। और जब तक प्रशासन के कामकाज में दृढ़ता और निष्पक्षता नहीं आएगी, तब तक हम स्थिति में बदलाव की ज्यादा उम्मीद नहीं कर सकते।
एक कोई घटना हो जाए और हम उससे सबक लेकर न संभले, तो वह दूसरी घटना के लिए नजीर बन जाती है। दुर्भाग्य से हमारा प्रशासन तंत्र न तो कोई सबक लेना चाहता है और न ही जवाबदेही। इसलिए देश में कहीं कोई घटना होती है, तो वह कई दूसरी घटनाओं के लिए प्रेरणा बन जाती है और फिलहाल तो यही चल रहा है।
-लेखक केंद्रीय मंत्री और जम्मू कश्मीर के राज्यपाल रहे हैं।