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कप्तानी जब बोझ बन जाए

सम्पादकीय. टीम लीडर की संक्षिप्त पारी खेलने के बाद अंतत: राहुल द्रविड़ उर्फ मिस्टर रिलायबल ने भारतीय क्रिकेट टीम की कप्तानी छोड़ दी। द्रविड़ का यह निर्णय इस मायने में अप्रत्याशित है कि पेशेवर क्रिकेट के वर्तमान दौर में जब अधिकतर खिलाड़ी अपनी मांग को बनाए रखने की जुगत भिड़ाते रहते हैं, तब उन्होंने नेतृत्व छोड़कर और बल्लेबाजी की कुंद होती धार को तेज करने के लिए यह हिम्मत दिखाई है।

द्रविड़ के इस निर्णय से यह साबित होता है कि कप्तानी के मैदानी व बाहरी तनाव को लंबे समय तक झेलने की उनमें क्षमता नहीं थी, जिसे उन्होंने खुले मन से स्वीकारा। मीडिया की आलोचना का भी वे कुशलता से सामना नहीं कर पाते थे।

जहां तक कप्तानी की सफलता के आंकड़े हैं वे राहुल के पक्ष में हैं। उनके नेतृत्व में भारत 25 टेस्ट में से 8 में विजयी हुआ तथा 11 टेस्ट ड्रॉ रहे। शेष में भारत को हार का सामना करना पड़ा। वनडे में भी भारत ने 79 में से 42 में जीत दर्ज की तथा 33 में पराजय मिली।

इसके बावजूद उन्हें कभी चतुर और प्रेरणादायी कप्तान नहीं माना गया। उनका यह दुर्भाग्य है कि उनकी तुलना हमेशा सौरव गांगुली जैसे मंझे हुए कप्तान से होती रही।

हाल ही में संपन्न इंग्लैंड दौरे में उन्हें कई बार गलत निर्णय लेने के कारण मीडिया की आलोचना का शिकार होना पड़ा। एक बार उन्होंने कह दिया कि हमारे गेंदबाज थके हुए थे, इसलिए पहले बल्लेबाजी का निर्णय लिया। उनके इस कथन की जहीर खान ने यह कहकर आलोचना की थी कि गेंदबाजों के थकने का सवाल ही नहीं उठता है।

इसमें कोई शक नहीं कि इंग्लैंड दौरे में उन्हें सचिन व सौरव गांगुली ने भरपूर सहयोग दिया, फिर भी उनमें नेतृत्व के गुणों का विकास नहीं हो सका। उनके नेतृत्व में वल्र्ड कप में भारत का दयनीय प्रदर्शन लोग अभी भूले नहीं हैं।

उसी प्रकार कोच ग्रेग चैपल की छायामात्र बनकर रहने के कारण भी उन्हें कई बार तीखी आलोचना का शिकार होना पड़ा था। 112 टेस्ट में 9492 रन बना चुके राहुल अभी 33 साल के हैं तथा यदि वे सिर्फ बल्लेबाजी पर ही ध्यान देते हैं, तो वे कई सालों तक खेलते रह सकते हैं।

राहुल की तुलना ऑस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पोंटिंग से नहीं जा सकती जिन्होंने कप्तान बनने के बाद शतकों की झड़ी लगा दी। जब नेतृत्व बोझ लगने लगे, तो पद त्याग देना ही बेहतर विकल्प होता है। द्रविड़ के यह विकल्प अपनाने से उनकी छवि उज्ज्वल हुई है।





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