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धौलपुर. अंतर्कलह व गुर्जर आंदोलन से जूझ रही मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के प्रयास उनकी ही ससुराल धौलपुर में विफल हो गए। डेमेज कंट्रोल के लिए भेजे गए मंत्रियों को वहां से उलटे पांव लौटना पड़ा। इतना ही नहीं चोपड़ा कमेटी की रिपोर्ट मिलते ही गुर्जरों को आरक्षण की चिट्ठी भिजवाने का भरोसा दिलाकर आंदोलन को खत्म कराने की योजना पर भी पानी फिर गया।
धौलपुर से गुर्जरों के एलान-ए-जंग की घोषणा को देखते हुए मुख्यमंत्री ने अपने खास लोगों को डेमेज कंट्रोल व आंदोलन को खत्म कराने के लिए भेजा था। इनमें सार्वजनिक निर्माण मंत्री राजेन्द्रसिंह राठौड़, ग्रामीण विकास एवं पंचायतीराज मंत्री कालूलाल गुर्जर, जन अभाव अभियोग निराकरण समिति के अध्यक्ष एस.एन. गुप्ता और ओएसडी धीरेन्द्र कमठान थे। इनकी मदद के लिए एनवक्त पर पार्टी महामंत्री रामलाल जाट को भी रवाना किया गया।
यह थी सरकार की योजना
गुर्जर आंदोलन की दिशा बदलने व विरोधियों को करारा जवाब देने के लिए सरकारी खेमे ने सबसे पहले वहां के प्रभावशाली और स्थानीय पूर्व विधायक जसवंतसिंह को इस आंदोलन से अलग करने की योजना बनाई। पार्टी महामंत्री रामलाल चौधरी व कालूलाल गुर्जर को इस निर्देश के साथ भेजा गया था कि वे कर्नल किरोड़ीसिंह के माध्यम से यह भरोसा दिलाएं कि चोपड़ा कमेटी की रिपोर्ट मिलते ही सरकार गुर्जरों की रिपोर्ट भेज देगी। जरूरत पड़ने पर कालूलाल गुर्जर या रामपाल को मंच पर जाकर यह भरोसा देने को भी कहा गया था।
जसवंतसिंह ने दिया पहला झटका
सरकार के डेमेज कंट्रोल को उस समय पहला झटका लगा जब जसवंतसिंह ने उन्हें मनाने गए राजेन्द्रसिंह राठौड़, एस.एन. गुप्ता व कमठान को घर के दरवाजे से ही बैरंग लौटा दिया। जसवंतसिंह ने इन लोगों से कहा कि आपने मुझे भाजपा का तो नहीं रहने दिया, लेकिन कौम का तो रहने दो। जसवंतसिंह ने मंच पर भी सरकार की इस योजना का यह कहकर खुलासा कर दिया कि आंदोलन को विफल करने के लिए सरकार ने कुछ लोग सभा में भेजे हैं। उनके पड़ोसी उन्हें पकड़कर बिठा लें।
यह थी चाणक्य नीति
सरकार की ओर से चिट्ठी भिजवाने का भरोसा दिलाने का संदेश कर्नल किरोड़ीसिंह तक पहुंचा दिया गया था। योजना यह थी कर्नल अपने भाषण में ही इसका खुलासा करेंगे और रामपाल सिंह तथा कालूलाल गुर्जर को बुलाकर उनसे इस बात की घोषणा कराएंगे। ये दोनों नेता सभास्थल से मात्र 10 किलोमीटर दूर तालाबशाही पर दिनभर बुलावे का इंतजार करते रहे। इसके पीछे मकसद भाजपा से निष्कासित विधायक प्रहलाद गुंजल और उनके समर्थकों को करारा जवाब देना था। सरकारी सोच यह थी कि इससे सभा का माहौल बदल जाएगा और कर्नल किरोड़ीसिंह बैसला का प्रभाव भी बढ़ जाएगा।
नहीं चला कर्नल का दांव
कर्नल किरोड़ीसिंह बैसला धौलपुर महापंचायत में अपना सिक्का नहीं जमा सके। हुआ यह कि कर्नल ने भाषण की शुरुआत में ही एक माह का समय और मांग लिया। इसका विरोध करते हुए लोगों ने तुरंत आंदोलन की घोषणा की मांग की। लोग उठ खड़े हुए और मंच पर भी अव्यवस्था हो गई। संभवत: कर्नल को पहली बार किसी महापंचायत में ऐसा विरोध देखने को मिला। नतीजा यह हुआ कि कर्नल को आंदोलन की घोषणा करनी पड़ी। सरकार की ओर से चिट्ठी भिजवाने का वे जनता को भरोसा दिला नहीं पाए। इधर, मंच से मुख्यमंत्री और उनके परिजनों को जमकर कोसने से नाराज होकर रामपाल जाट और कालूलाल गुर्जर भी चले आए।
ऐसे हुई सरकारी रणनीति फेल
जसवंतसिंह को मनाने के सरकारी प्रयासों से ही मुख्यमंत्री विरोधियों ने सरकार की मंशा का अंदाजा लगा लिया था। एनवक्त पर रणनीति बदली। कर्नल से आंदोलन की घोषणा कराने की बात तो हालांकि रात में ही तय कर दी गई, लेकिन पब्लिक को अपने पक्ष में बांधे रखने की रणनीति हाथोंहाथ बनाई गई। जसवंतसिंह ने मंच संचालन खुद संभाला। उन्होंने कर्नल किरोड़ीसिंह बैसला के कुछ समर्थकों को शुरू में ही बुलवा दिया तो कुछ को समय अभाव बताकर बोलने का मौका ही नहीं दिया, जबकि प्रहलाद गुंजल सहित विरोधी गुट के लोगों के भाषण बाद में कराए गए। इससे माहौल आंदोलन की तुरंत घोषणा करने के पक्ष में हो गया।
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