नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि महिलाओं के प्रति अपराध करने वाले दया के पात्र नहीं हैं। ऐसे लोगों को सख्त सजा दी जानी चाहिए, अन्यथा समाज
का ताना-बाना ही बिखर जाएगा।
जस्टिस अरिजीत पसायत और जस्टिस पीपी नाओलकर की बेंच ने यह व्यवस्था देते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया जिसमें 10 साल की बालिका से दुष्कर्म के एक मुजरिम की सजा कम कर दी गई थी। बेंच ने टिप्पणी की कि समाज का संरक्षण और आपराधिक प्रवृत्ति को उखाड़ फेंकना कानून का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। यह लक्ष्य तभी हासिल किया जा सकता है, जब मुजरिमों को उचित दंड दिया जाए।
बेंच ने कहा कि अधीनस्थ कोर्टो को किसी मुजरिम पर बेवजह दया करके कम दंड देने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया गया तो न्याय प्रणाली को नुकसान पहुंचेगा और कानून में आम जनता का भरोसा हिल जाएगा।
क्या मामला था : कर्नाटक की गुलबर्गा सेशन कोर्ट ने बालिका से दुष्कर्म के मुजरिम राजू को आईपीसी की धारा 376 (2) के तहत सात साल कैद की सजा सुनाई थी। इस संगीन अपराध के लिए न्यूनतम सजा 10 साल की कैद है। इसके बावजूद हाईकोर्ट ने इस आधार पर सजा आधी कर दी कि मुजरिम सिर्फ 18 साल का है। इसके अलावा वह पढ़ा-लिखा भी नहीं है। इस पर राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में फैसले को चुनौती दी जहां ट्रायल कोर्ट के फैसले को बहाल कर दिया गया।