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Chhattisgarh
Raipur Raipur सुकमा. राशन दुकानों का खाद्यान्न नक्सलियों तक पहुंचने से रोकने की कोशिश के तहत कोंटा ब्लाक की 55 राशन दुकानों में से 48 को खाद्यान्न की आपूर्ति गत जुलाई माह से बंद कर दी गई है। ब्लाक की अधिकतर राशन दुकानों में केरोसिन तो पिछले डेढ़ साल से आया ही नहीं। सारा खाद्यान्न सलवा जुड़ूम शिविरों में ट्रांसफर कर दिया गया है।
फैसला करते समय इस बात का ध्यान किसी ने भी नहीं रखा कि शिविर में रहने वाले 30 हजार लोगों के अलावा ब्लाक के दूरस्थ गांवों में आज भी 60 हजार से ज्यादा लोग रह रहे हैं। इन लोगों को राशन का चावल, केरोसिन नहीं मिल रहा। गरीब आदिवासी जमीन के पट्टे और गहनों को गिरवी रखकर खाद्यान्न का जुगाड़ कर रहे हैं।
नक्सली समस्या पर विधानसभा में हुए खास सत्र में कोंटा ब्लाक की राशन दुकानों की सप्लाई बंद करने का निर्णय लिया गया था। ब्लाक के एसडीएम भगवान सिंह उइके का कहना है कि उन्हीं राशन दुकानों को बंद किया गया है, जहां के लोग सलवा जुड़ूम शिविरों में रहने आ गए हैं।गांव वीरान हैं, इसलिए वहां राशन भेजने का कोई औचित्य नहीं था।
बचे खाद्यान्न को सलवा जुड़ूम शिविरों में दिया जा रहा है, जहां लोग रह रहे हैं। यह प्रशासन का पक्ष हो सकता है, लेकिन सच्चई इससे कहीं अलग है। ब्लाक के सौ से ज्यादा गांव आज भी पहले की तरह आबाद हैं। प्रशासन इस बात को मानने तैयार नहीं है।
आंकड़े कह रहे अलग कहानी
वह बात दूसरी है कि सरकारी आंकड़े ही उसकी कलई खोल रहे हैं। सलवा जुड़ूम शिविरों में कुल जमा 30 हजार के आसपास लोग हैं, जबकि ब्लाक की आबादी एक लाख से कुछ ज्यादा है। बाकी बचे करीब 60 हजार पात्र कार्डधारियों के बारे में कोई वैकल्पिक व्यवस्था अब तक प्रशासन ने नहीं की है।
फैसले के बाद कोंटा शहर में संचालित दो राशन दुकानों समेत केवल सात राशन दुकानें चल रही हैं। दुकानों को बंद करने के मामले में भी कोई तय पैमाना नहीं है। चिंतलनार जैसे गांवों की राशन दुकानों को भी प्रशासन ने बंद करवा दिया है, जहां पुलिस की नियमित उपस्थिति है। चिंतागुफा जैसे इलाकों में राशन दुकान चल रही है, जहां नक्सलियों के डर से पुलिस भी बिना पूरी तैयारी के नहीं जाती।
दुकानों से राशन ले जाते थे नक्सली
कोंटा ब्लाक धुर नक्सली इलाका है। ब्लाक के अंदरूनी हिस्से में संचालित राशन दुकानों में खाद्यान्न की अफरा-तफरी की शिकायतों के बीच प्रशासन को खबर थी कि नक्सली इन दुकानों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
नाम न छापने की शर्त पर जगरगुंडा समेत कई इलाकों में राशन दुकानों का संचालन करने वाले कई सोसायटी मैनेजरों और सेल्समैनों ने इसकी पुष्टि की है। सेल्समैनों का कहना है कि नक्सली अक्सर उनकी दुकानों से बकायदा पूरा पैसा देकर खाद्यान्न ले जाते थे।
हाल के कुछ सालों में नक्सलियों द्वारा कोंटा ब्लाक में एक भी राशन दुकान को नहीं लूटा जाना दिखाता है कि दाल में कुछ काला तो जरूर है। राशन दुकानों के खाद्यान्न में कटौती का काम पिछले साल फरवरी में सलवा जुड़ूम अभियान के जोर पकड़ने के बाद हुआ। नक्सलियों के डर से कई गांवों के हजारों लोग पलायन करके कोंटा समेत पांच स्थानों पर चल रहे राहत शिविरों में आ गए।
साल भर से नहीं राशन
प्रशासन ने राशन दुकानों को खाद्यान्न सप्लाई बंद करने का काम चरणों में किया। गत वर्ष फरवरी में 33 दुकानों की सप्लाई बंद की गई। बाकी 15 दुकानों को गत जुलाई में बंद किया गया।
हालांकि सामचेट्टी समेत ब्लाक के कई गांवों में पहुंचे संवाददाता ने पाया कि वहां साल भर से राशन गया ही नहीं। जिला मुख्यालय से इन दुकानों के निकला राशन जमीन खा गई या आसमान निगल गया किसी को पता नहीं। गांव वाले कलेक्टर से लेकर मंत्री तक सबसे शिकायत कर चुके, कोई फायदा नहीं हुआ।
सलवा जुड़ूम शिविरों की जगह अपने गांव में रहने वाले आदिवासियों को दुकानें बंद हो जाने से भारी समस्या हो रही है। जो चावल उनको मुफ्त या तीन रुपए प्रति किलो के आसपास मिल जाता, उसे खरीदने के लिए नौ रुपए या उसके भी ज्यादा रकम खर्च करनी पड़ रही है। बारिश में नदी, नालों के कारण कट गए गांवों में क्या हाल है किसी को पता नहीं।
सामान गिरवी रख खरीद रहे अनाज
कोंटा से 50 किमी दूर स्थित ग्राम सामचेट्टी के सरपंच मिडियामी बुदरी ने बताया कि उनके गांव की राशन दुकान में साल भर से खाद्यान्न नहीं पहुंचा है। कई गांवों को मिलाकर बनी इस ग्राम पंचायत की आबादी चार हजार से ज्यादा है। गांव में रहने वाले कवासी लक्का ने बताया कि उसने अपनी जमीन का पट्टा सुकमा के एक साहूकार के यहां गिरवी रखकर राशन का इंतजाम किया है।
साहूकार से उसने कितने रुपए लिए वह ठीक-ठीक नहीं बता पाता। इसी पट्टे के भरोसे कवासी के अलावा उसके पड़ोसी कवासी सुकड़ा, हेमला सोमी के घरों में चूल्हा जल रहा है। इसी गांव के कवासी हिड़मा ने भी अपनी जमीन का पट्टा गिरवी रखकर राशन की व्यवस्था की है।
पिछले साल सलवा जुड़ूम के चलते वे धान की बोनी नहीं कर पाए थे। राशन दुकान बंद हो जाने से बीज के लिए रखा धान भी लोगों ने कूट कर खा लिया। आज उनके पास खाने के लिए कुछ नहीं है।
ताड़मेटला इलाके के सरपंच माड़गी दुला ने बताया कि भुरकापाल गांव में पिछले डेढ़ साल से सरकारी दुकान में राशन आया ही नहीं। आंध्रप्रदेश के चेरला इलाके से सटे इस गांव के लोग पड़ोसी राज्य में अपने गहने बेचकर खाद्यान्न ला रहे हैं।
चिंगीपेंटा की राशन दुकान के सेल्समैन विजय भास्कर ने बताया कि उसकी राशन दुकान में पिछले डेढ़ साल से सप्लाई बंद है। गांव में वह क्या करता। इन दिनों वह सुकमा में ही रहता है। कोंटा से 20 किमी दूर स्थित गांव मेहता में आज भी तीन हजार से ज्यादा लोग रहते हैं। नक्सलियों ने रास्ते जगह-जगह से काट दिए हैं। गत जुलाई से गांव की राशन दुकान में खाद्यान्न की सप्लाई नहीं हो पा रही।
-------किस शिविर में कितने लोग
कोंटा ब्लाक में पांच सलवा जुड़ूम शिविर संचालित हैं। इसमें दोरनापाल शिविर में 17 हजार, इंजरम में 3 हजार 216 , एर्राबोर में 43 सौ, कोंटा में 4 हजार 268, मरईगुड़ा में 1 हजार 956 लोग रह रहे है। शिविरों में रहने वाले आदिवासियों का सरकारी आंकड़ा 30 हजार 740 के आसपास बैठता है।
---------सात राशन दुकानें चल रहीं
कोंटा में दो राशन दुकान, चिंतागुफा, पोलमपल्ली, डोंडरा, मरईगुड़ा, दोरनापाल।
जहां की राशन दुकानें बंद हैं-
दरभागुड़ा, मेहता, सिंगारम, मनीकोंटा, कोत्ताचेरू,मरईगुड़ा, भेज्जी, इंजरम, पालाचलमा, गंगलेर, आरगट्टा, डब्बकोंटा, टेटरई, पुनपल्ली, ताड़मेटला, कांकेरलंका, मिसमा, चिंतलनार, मुकरम, बगड़ेगुड़ा, मोरपल्ली, केरलापेंदा, मिलमपल्ली, नागाराम, गुमोड़ी, गोंदपल्ली, सिलगेर, जगरगुंडा, मेडवाही, चिमलीपेंटा, एलमागुंडा, कामाराम, पेंटा, कोरापाड, गोरगुंड़ा, सामसट्टी, दुलेड, कुंदेड़, गोंदपल्ली, कोंडासावली, पालामड़ग़ु, मुलाकिसोरी , कोंटा, दुब्बाटोटा, एलमपल्ली, एर्राबोर, गोलापल्ली, पेंडापाड।
--------ब्लाक के लिए कुल राशन आबंटन
५१00 क्विंटल प्रतिमाह
४५00 क्विंटल सलवा जुड़ूम शिविरों में खप रहा।
शेष ६00 क्वटल चावल वर्तमान में संचालित ६ राशन दुकानों को दिया जा रहा।