HomeMagazineBachhon Ka Kona Bachhon Ka Kona

घर के घर में

school and homeपहले स्कूलों पर जो भरोसा था वह शायद धीरे-धीरे टूट रहा है। बड़े पैमाने पर तो नहीं फिर भी कई लोग ऐसे हैं, जो अपने बच्चों को घर पर ही पढ़ा रहे हैं। इसके नतीजे नजर भी आ रहे हैं। नौ साल की शैली दारूवाला को लीजिए। अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि रुडयार्ड किपलिंग और फारसी के जगप्रसिद्ध सू़फी कवि खैयाम को वह फर्राटे से पढ़ती हैं। यही नहीं मुंबई के मुहम्मदी होम स्थित अपने घर के किचन को उसने प्रयोगशाला में बदल डाला है, जहां वह तरह-तरह के प्रयोग करती है।

शैली अकेली नहीं है। छह वर्षीय बहन खदीजा भी उसके साथ घर पर ही पढ़ाई करते हुए तेजी से अंग्रेजी सीख रही है। जबकि भाई सुलैमान और यूसु़फ घर में ही पढ़ने के अलावा कंप्यूटर आदि भी ठीक कर लेते हैं। इन बच्चों से मिलने पर अहसास होता है कि यह अपनी उम्र से जयादा जानकार और समझदार हैं। माता-पिता इसका कारण इन बच्चों की पढ़ाई घर पर ही होना बताते हैं। यह ऐसे बच्चे हैं, जो पाठयक्रम, टाइम टेबल, भारी-भरकम बस्तों और कड़वा-कसैला बोलते टीचर्स से मुक्त माहौल में पढ़/बढ़ रहे हैं।

दरअसल शैली के घर वाले उन लोगों में शामिल हैं, जो देश की शिक्षा प्रणाली की असफलता से भर पाए। इन्हें लगता है कि आज के स्कूलों में पढ़कर बच्चे वह नहीं बन home is my 1st schoolपा रहे, जो माता-पिता उन्हें बनाना चाहते हैं। यही देख बच्चों को घर पर शिक्षित करने का रुझान Êाोर पकड़ रहा है। जोगेश मोटवानी और लक्ष्मी रंगराज को लीजिए, जो अपनी तीन साल की बिटिया 'माहुली' का नाम तक स्कूल में नहीं लिखवाना चाहते। मोटवानी कहते हैं, 'हम उसे कुछ कारणों से स्कूल नहीं भेज रहे हैं। हम उसके मुंह में सिगरेट नहीं देखना चाहते। यह उसके लिए बहुत भयानक है।' वह माहुली की परवरिश गांधीवादी सिद्धांतों पर करने के साथ यह भी चाहते हैं कि उसमें सामाजिक न्याय की Êाबर्दस्त समझ पैदा हो।

घर पर ज्ञान अर्जित करने वालों की तादाद अमेरिका में लगभग बीस लाख है। इन बच्चों को शिक्षित करने में लगने वाली सामग्री का यहां अति विशाल बाÊार है। साथ ही इन विद्यार्थियों के लिए अलग से नीति बनाए जाने हेतु विभिन्न दल सक्रिय हैं। इस सबका बाÊार लगभग 8700 लाख डॉलर्स का है। विभिन्न कारणों से धीरे-धीरे हमारे यहां भी इसी तर्Êा पर घरेलू शिक्षा शुरू हो गई है।

मुहम्मदी होम वालों के लिए 'इस्लामी मूल्यों' का मामला है। वह चाहते हैं कि उनके बच्चे अच्छे इस्लामी वातावरण में पढ़ें। शैली के माता-पिता निकहत और अशऱफ कहते हैं, 'हम नहीं चाहते कि हमारे बच्चे वह गंदी बातें सीखें, जो आजकल आम हो गई हैं।' वहीं नाहीद खान स्कूलों पर गलत तरी़का अपनाने का आरोप लगाती हैं, 'अंग्रेजी की वर्कशीट के आधार पर मेरी दस वर्षीय बेटी 'सना' को स्कूल के मनोचिकित्सक ने सीखने में कमजोर घोषित कर दिया। वह सना से कभी नहीं मिला और न ही उसने दीगर विषयों में आने वाले उसके अच्छे अंक देखे।' तब इन्होंने अपनी बेटी को मुकम्मिल तालीम घर पर देने का बहादुरी भरा फैसला लिया।

play schoolऐसी तालीम जिसमें न पाठयक्रम की बंदिशें हों न टाइम-टेबल का झगड़ा। माधवी दारुवाला कहती हैं, 'हम किसी कोर्स या टाइम-टेबल से नहीं चलते, न ही यह जरूरी है कि 45 मिनट तक पढ़ाई की ही जाए।' असल में सुचित्रा और शैली ने तय कर रखा है कि उन्हें रोजना क्या करना है। उनके पाठ कला, कठपुतली, किताबें पढ़ना, खाना पकाना या एजुकेशनल कार्यक्रम देखने से जुड़े हैं।

मोटवानी और रंगराज, माहुली को रोजाना समुद्र के किनारे ले जाते हैं। जहां वह लहरें देखती और समुद्र तथा उसमें रहने वालों के बारे में सवाल पूछती रहती है। यह भी शिक्षा है, जो बच्चों को वास्तविक संसार से जोड़ती तथा उनका शैक्षणिक और मानसिक स्तर ऊंचा उठाती है। ऐसे तरी़कों से बच्चों पर दबाव नहीं पड़ता, न वे तनाव का शिकार होते हैं। अशऱफ मानते हैं कि खदीजा को कभी-कभी स्कूल के साथियों की कमी खलती है, मगर हम इसकी भरपाई स्वीमिंग क्लासेस और रीडिंग ग्रुप से कर लेते हैं।

प्राचीन तरी़का>> घर की शिक्षा में स्कूल जाना जरूरी नहीं होता। बच्चे घर पर ही शिक्षा प्राप्त करते हैं। कई बार उन्हें पत्राचार के माध्यम से होने वाली परीक्षा दिलवाई जाती है। इसका मुख्य कारण यह सोच है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली बच्चों को समुचित शिक्षा देने में सक्षम नहीं है।

>> घरेलू शिक्षा का तरी़का 19वीं सदी में भी प्रचलित था। तब तमाम शिक्षा घर पर ही होती थी। रवींद्रनाथ टेगौर, बच्चों के लिए 'द क्रॉनिकल ऑफ नर्निया' लिखने वाले सीएस लुइस और 1983 में भौतिकी के नोबल पुरस्कार विजेता सुब्रमनियन चंद्रशेखर आदि ने घर पर ही पढ़ाई की।

>> प्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री रे मूर और डोरोथी मूर ने 1970 में अध्ययन किया था। उनके अनुसार समुचित विकास के लिए बच्चों को तब तक स्कूल नहीं भेजना चाहिए, जब तक कि वह दस साल के न हो जाएं।

घर बैठे आई दुनिया द्वार

रवींद्रनाथ टैगोरगुरुदेव रवींद्रनाथ टेगौर मात्र कुछ दिन ही स्कूल गए। उसके बाद फिर उन्होंने विद्यालय का मुंह न देखा। उन्हें जितनी भी डिग्रियां-उपाधियां मिलीं, वह सब मानद थीं, जो कविवर को का़फी उम्र बाद ससम्मान दी र्गइ। वह लिखते हैं, 'स्कूल ऐसे विनिर्माण केंद्र हैं, जो एक जैसे परिणाम निकालने के लिए बनाए जाते हैं। सो मेरे मस्तिष्क ने स्कूल की पाबंदियों को स्वीकार करना शुरू कर दिया था। ये (पाबंदियां) किसी महिला के तंग जूते की तरह थीं, जो हर घड़ी मेरे मन-मस्तिष्क को हर तऱफ से दबोचे रहती थीं।'

एंसल एडम्ससुप्रसिद्ध अमेरिकी फोटोग्राफर एंसल एडम्स को स्कूल में सबका एक जैसा दिखना नहीं भाता था। इसलिए उन्होंने ़खुद को शिक्षित करने के लिए 1915 में स्कूल छोड़ दिया। उस समय उनकी उम्र थी मात्र 12 वर्ष। एडम्स को आज फोटोग्राफी पर कई किताबें लिखने वाले के रूप में जाना जाता है। इनमें कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकों के अलावा 'द कैमरा', 'द निगेटिव एंड द प्रिंट' जैसी फोटोग्राफी की दिशा निर्देशिकाएं भी हैं। इसके अलावा फोटोग्राफी में उनकी पहचान 'विजुअलाइजेशन' से आगे जाकर 'प्री-विजुअलाइजेशन' की परिकल्पना देने वाले के रूप में भी है।

रिचर्ड फिनमैन1965 में संयुक्त रूप से भौतिकी का नोबल पाने वाले फिनमैन की पूरी शिक्षा घर पर ही हुई। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान गठबंधन देशों के लिए परमाणु बम बनाने वाले मैन हट्टन प्रोजेक्ट तथा स्पेस शटल चैलेंजर में हुए धमाके की जांच करने वाली टीम के वह सबसे युवा सदस्य थे। फिनमैन के जीवनीकारों ने पाया कि उसने सारी शिक्षा लगातार अध्ययन और अपने पिता से चर्चाएं करके पाई।

क्रिस्टोफर पाओलिनी'एरागॉन' और 'एल्डेस्ट' जैसी किताबों के लेखक पाओलिनी ने घर पर पढ़ाई की। 15 साल की उम्र में उन्होंने पत्राचार द्वारा अमेरिकन स्कूल, शिकागो, इलीनॉइस से स्नातक कर लिया। स्नातक होते ही वह अपने उपन्यास 'एरागॉन' लिखने में जुट गए थे।

मान बरुआप्रकृति व पक्षी विज्ञानी मान बरुआ देश के ऐसे युवा हैं जिनसे बहुत सी उम्मीदें बांधी जा सकती हैं। सन् 2004 में उन्हें युवा प्रकृतिवादी का ़िखताब मिला। अरुणाचल प्रदेश में तीतर, लद्दा़ख में गरुड़ तथा देश के घने जंगलों में हुए अन्य पक्षियों के सर्वे में बरुआ की भागीदारी रही। असम के जंगलों को बचाने के लिए वह युवाओं के साथ काम कर रहे हैं। मान बरुआ काजीरंगा और असम के पक्षियों पर दो पुस्तकें भी लिख रहे हैं।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड:
 

आपके विचार
sameer
Monday, 17th Sep 2007, 10:09
ghar me siksha dena achi baat hai lakin jo khuch bachoon ko school me sikhne ko milta hai woh ham ghar me nahi sikha sakte haan ye bhi hai ki bahar ka mahul aj kal thik nahi hai ham apne bachoon ko bahar bhejte hue bhi darte hain lakin risk to lena hi padta hai apni apno soch hai sabki
sumit
Sunday, 30th Sep 2007, 10:36
very nice and funney,keep it up.thankyou.
Imran Gauri
Sunday, 13th Jan 2008, 11:11
Home study ,such a good thing .......But where the parents could not balence his child's study there it is a Crush thing. So if u give home study to his child that time u also need more time and freedom to fight rules of government.