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Chandigarh Chandigarh जालंधर.
वे पहुंचे अपने शहर में लोगांे ने कहा वैलकम 'माई' लॉर्ड। तभी उन्हांेने बताया शहर के लिए अपना विजन कि बेरोजगारी को जड़ से खत्म करना होगा और एजुकेशन को ग्रैजुएशन से आगे बढ़ाना होगा।
जालंधर काफी बदल चुका है। पिछले साल जब मैं आया था तब से आज तक काफी बदलाव आ चुके हैं। मेरा मानना है बदलाव हमेशा जरूरत के अनुसार होने चाहिए। डिवलैपमेंट का जरूरी अंश है शहर को सपनों की नगरी बनाने के लिए विजन का होना।
यह बात केपेरो ग्रुप के चेयरमैन लार्ड स्वराज पॉल ने कही। सिटी में केपेरो पीटीयू स्कूल ऑफ मैन्यूफैक्चरिंग एंड मैटीरियल टैक्नोलॉजी के इनोगरेशन के लिए पहुंचे लार्ड स्वराज पॉल ने सिटी भास्कर को बताई अपने दिल की बात कि कैसा चाहते हैं वो अपना होम टाउन
विजन जालंधर पंजाब की प्राइम स्टेट है और इसका हर तरफ से डिवैलप होना बेहद ही जरूरी है।
एजुकेशन बेरोजगारी को जड़ से खत्म करना होगा और शिक्षा को सिर्फ ग्रैजुएशन तक सीमित न रखकर हायर एजुकेशन तक ले जाना होगा। तभी जालंधर दस सालों में बढ़ेगा।
इंफ्रास्ट्रक्चरसपनों की नगरी बनाने के लिए जालंधर में कई बदलाव आ चुके हैं। जरूरत के अनुसार जब शहर का बदलाव होगा तो यकीनन सिटी को नया रंग, रूप और उमंग देगा।
इंडस्ट्रीमैन्युफैक्चरिंग ही एक मात्र रास्ता है जिससे चाइना को टक्कर दी जा सकती है। जो शहर में ग्रो कर सकती है।
थिंकिंगमैं आशा करता हूं जालंधर में पैदा होने वाले हर बच्चे को हर तरह की अपॉरच्यूनिटी मिले जिसे वे एक्सप्लोर कर सकें और अपनी सोच के साथ साथ अपने जीवन को भी सुधार सकें।
शहर से लगावलार्ड पॉल हर बात में जालंधर का जिक्र करना नहीं भूले। जालंधर से इंग्लैंड तक के सफर में उनका सबसे यादगार पल जालंधर है। उन्होंने कहा आई लव जालंधर एंड आई वांट इट टू बी डिवैलप्ड। अपने कॉलेज को याद किए बिना वो रह न पाए उन्होंने कहा दोआबा कॉलेज में मैंने सिर्फ 2 साल गुजारे लेकिन जिंदगी में कभी भी उन पलों को भूल न पऊंगा।
मेहनत से छुआ आसमान जालंधर में 1931 में पैदा हुए लार्ड स्वराज पॉल ने अपने हार्ड वर्क से उन ऊंचाइयों को छुआ जो किसी का सपना हो सकता है। पंजाब यूनिवर्सिटी, दोआबा कॉलेज और यूएस की एमआईटी से पढ़े स्वराज पॉल ने जिंदगी में इसके लिए काफी मशक्कत की। जिंदगी हर मोड़ पर उनका इम्तिहान लेती गई और वे हर मुकाम जिंदादिली से पार करते गए।
पिता द्वारा शुरू किए गए एपीजे ग्रुप को ज्वाइन करने के तुरंत बाद उन्हें वापस अपनी बेटी अंबिका के इलाज के लिए लंदन जाना पड़ा। उन्होंने वहीं से एपीजे बिजनैस को संभालना शुरू किया और 1966 में वहीं सैटल हो गए। एपीजे फैमिली की पार्टीशन के बाद उन्होंने अपनी कंपनी का नाम केपेरो रखा। एक स्टील यूनिट से शुरू हुए बिजनैस के जरिए आज ब्रिटेन के अमीर लोगों में गिने जाते हैं। उन्हें 1983 में इंदिरा गांधी द्वारा पद्म भूषण अवार्ड भी दिया गया।