अमृतसर. दफ्तर हो या स्कूल, हर संस्थान में कोई न कोई ऐसा इंप्लाई जरूर मिल जाएगा जो बात-बात पर रोता हो। इससे जहां सीनियर्स को परशानी होती है, वहीं सहकर्मी भी मुश्किल में पड़ जाते हैं कि उसे चुप करवाएं या फिर अपने काम में जुटें। रिपोर्टर ने अलग-अलग आफिस में जाकर जाना कि उनके यहां ऐसे कितने इंप्लाई हैं। कुल 20 आफिस में जाने पर उनमें से 17 आफिसेज के कर्मचारियों ने बताया कि उनके यहां भी ऐसे ही इंप्लाई हैं।
पूरा आफिस प्रभावित होता है एक विज्ञापन कंपनी में काम करने वाली स्वाति बताती है कि उसकी फ्रैंड प्रभा हर छोटी-मोटी बात में रोना शुरू कर देती है। बॉस की हलकी सी फटकार, मनमाफिक एसाइनमेंट नहीं मिलने या वर्क लोड के कारण वह कब रोना शुरू कर दे, इसका किसी को पता ही नहीं चलता। यह मुश्किल तब और बढ़ जाती है, जब उसे चुप कराया जाता है, तो वह और जोर-जोर से रोना शुरू कर देती है। इससे सारा आफिस प्रभावित होता है।
बहुत जिल्लत उठानी पड़ती है इंश्योरेंस सेक्टर में काम करने वाली नलिनी बताती हैं कि हर समय काम का प्रैशर रहता है। उसकी कुलीग मंत्रा इस दबाव को सहन नहीं कर पाती और तरह-तरह के बहाने बना कर रोती है। जो कोई भी उसे चुप कराता है, उसे भी उसकी बातें सुननी पड़ती हैं। क्योंकि रोते समय वह किसी की कोई बात नहीं सुनती। इससे आफिस का सारा माहौल खराब हो जाता है। आने-जाने वालों के सामने बहुत जिल्लत उठानी पड़ती है।
काम तो करना ही है साक्षी बताती है कि वह एक प्राइवेट टेलीकॉम कंपनी में काम करती हंै। उसके साथ और लड़कियां भी काम करती हैं। उनमें से एक ऊर्वशी हंै, जो बात-बात पर आंसू टपकाना शुरू कर देती हैं। कभी किसी कस्टमर ने ऊंची-नीची बात कर दी या फिर शाम तक टारगेट अचीव नहीं हुआ, तो वह आंसू टपकाना शुरू कर देती है, जो बहुत बुरा लगता है। आंसू टपकाने के साथ उसे काम तो पूरा करना ही पड़ता है, फिर रोने से क्या फायदा।
बताया तो हुआ अहसास दीपिका बताती हैं कि वह स्कूल में टीचर हैं। आए दिन पेरेंट्स की कंप्लेट सुननी पड़ती है। उनके यहां अंजु भी है, जो छोटी क्लासों को पढ़ाती हैं। एक दिन एक बच्चे के पेरेंट्स आए और उन्होंने अंजु से शिकायत की कि वह उनके बच्चे की ओर ध्यान नहीं देती। इस पर अंजु कोई बात करने की बजाए रोना शुरू हो गई। पेरेंट्स के चले जाने पर जब उन्होंने उसे समझाया तो अंजु को अहसास हुआ कि ऐसा नहीं करना चाहिए था।
रोने के लिए कई एक्सक्यूज मनजीत कौर ने बताया कि वह कास्मेटिक कंपनी में काम करती हंै। उसकी सहकर्मी तनुजा वैसे ही घर से परेशान हैं। अगर कंपनी में बॉस बुरा-भला कह दें, तो वह रोना शुरू कर देती हैं। गलती नहीं करने का प्रॉमिस करने के बजाए कई एक्सक्यूज बनाती हैं। जब इस बात पर उसे समझाया तो कहना शुरू कर देती हंै कि वह तो पहले ही परशान हंै, फिर उसे क्यों परशान किया जा रहा है। ढेरों खूबियां होने के बावजूद उसकी यह आदत बॉस के लिए सिरदर्द बन जाती है। इस झुंझलाहट में बॉस भी उसे कोई ज्यादा जिम्मेदारी वाला काम नहीं सौंपते।
अवायड करने लगते हैं सहकर्मी बीपीओज का काम करने वाली मालती बताती हैं कि उसकी फ्रैंड पिंकी आफिस में सबसे ज्यादा परफैक्ट हंै, लेकिन छोटी-मोटी बातों पर रोने की आदत ने उसकी कार्यक्षमता पर ग्रहण लगा दिया है। उसके रोने की आदत से चिढ़कर सभी सहकर्मी उसे अवायड करने लगते हैं। फिर आज के जमाने में अपनी मुश्किलें खुद ही निपटानी पड़ती है।
आंसुओं को नहीं रोक पाती हूं काजल बताती हैं कि उसे भी छोटी-छोटी बातों पर रोना आ जाता है। वह हर बार सोचती है कि अब नहीं रोउंगी पर चाहकर भी आसूं नहीं रोक पाती है।
रोने वालों में अलग-अलग लोग होते हैं। एक वह जो जिनके रोने की कोई ठोस वजह रहती है ,दूसरा वह जो अपने सहकर्मी या बॉस से सहानुभूति चाहते हैं। अधिकतर जो ज्यादा नहीं रोते उनका रोना सकारात्मक प्रभाव छोड़ता है। जो छोटी-छोटी बातों पर रोते हैं, वह इमोशनली अनस्टेबल होते हैं। उन्हें डिप्रेशन, साइकोसिस आदि कई इमोशनल बीमारियां होती हैं। -राजन गुप्ता, मनोचिकित्सक
कैसे बचें रोने से >>ऐसी परिस्थितियों को अवायड करें, जिससे आपको रोना आता हो। अकेले में अपने रिएक्शन को याद करें और मन भर कर रो लें।
>>रोना आ जाए तो अकेले में चले जाएं। कभी भी किसी को यह अहसास नहीं होने दें कि आपको रोना आ रहा है। अगर ऐसा सबके सामने हो जाता है, तो नार्मल होने पर सॉरी कहना न भूलें।
>>बार-बार रोने पर आप हंसी के पात्र बन सकते हैं।
रोने वैसे तो कार्यस्थल पर कभी भी रोना नहीं चाहिए। जब कभी भी काम के दबाव या किसी कारण आपको रोना आए तो आसुंओं को रोककर अपनी ताकत बनानी चाहिए। ऐसे ही आपको हर उस समस्या से लड़ने की ताकत मिलती है, जो आपको रुलाने वाली होती है। -मनीषा, प्रोफेसर