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कहां है समानता..?

दिल से.kunikaमेरा मानना है कि समाज और कानून स्त्री-पुरुष के समानता के अधिकार की दुहाई तो देता है, लेकिन आज भी स्त्री को समानता प्राप्त नहीं है। यह बात मैं पढ़े-लिखे, प्रगतिवादी समाज के संदर्भ में कह रही हूं, जबकि पिछड़े समाज में तो स्त्री की स्थिति और भी दयनीय है। रिश्तों के संबंध में ही स्त्री की स्थिति को देख लीजिए। भाई-बहन, बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड, पति-पत्नी.. कोई भी रिश्ता क्यों न हो, स्त्री को बराबरी की नजर से नहीं देखा जाता। अगर ऐसा कोई रिश्ता टूटता है, तो Êयादा ज़िम्मेदार औरत को माना जाता है।

लेकिन मेरा मानना है कि रिश्ते बनने या खत्म होने के लिए कोई ज़िम्मेदार नहीं होता। मैं अपना उदाहरण देती हूं। मैंने दो शादियां कीं और दोनों ही नहीं निभ सकीं। कुछ संकीर्ण विचारों के लोग मानते हैं कि शायद मुझ में कोई कमी होगी, जिस कारण मेरी दोनों शादियां टूट र्गइ। लेकिन असली बात मैं जानती हूं। मैं अपने किसी पूर्व पति को दोषी नहीं ठहराती, पर मैं खुद भी दोषी नहीं हूं।

कारण शायद सि़र्फ इतना है कि मैं नारी-स्वतंत्रता और समानता के अधिकार में विश्वास करती हूं। मेरा मानना है कि रिश्ते जीवन से ऊपर नहीं होते। जीवन भगवान की देन है और उसे पनपाने-बढ़ाने के लिए उसने जिस तरह अन्न, जल, वायु आदि चीजे बनाई हैं, उसी प्रकार भावनात्मक रिश्ते भी गढ़े हैं। लेकिन यहां अमर कुछ नहीं है। न जीवन, न रिश्ते। इसीलिए जिंदगी भर रिश्तों को रोना और ढोना गलत है।

समाज की तरह राजनीति में भी स्त्री को समानता प्राप्त नहीं है। आपको बताऊं कि मैं पिछले 20 सालों से समाज सेवा में भी लगी हुई हूं। मैं डॉ. जिलाडा के नेतृत्व में गांवों और शहरों में जाकर एड्स जागरूकता अभियान चलाती रही हूं। मैंने एंटी करेप्शन के क्षेत्र में भी काफी काम किया है। मुझे महसूस हुआ कि राजनीति में जाकर मैं बेहतर ढंग से समाज सेवा कर सकती हूं, इसलिए मैं 2005 के नगरसेवक के चुनाव में खड़ी हो गई। तब मैंने देखा कि महिला उम्मीदवारों को पार्टी से लेकर मतदाता तक पुरुष उम्मीदवारों के मुकाबले कम ही महत्व देते हैं। उस दौरान के राजनीतिक अनुभव में सबसे दुखदायी चीज थी, चुनाव में व्याप्त भ्रष्टाचार।

क्या आप य़कीन करेंगे कि वहां भी दलाल सक्रिय हैं। मेरे पास तीन-चार दलाल आए थे। कोई कहता था कि मुझे 20 हजार रुपए दे दो, मैं 35 हजार वोट आपको दिलवा दूंगा, तो कोई 50 हजार के बदले जिताने का प्रस्ताव देता था। लेकिन मैंने सबसे सा़फ कह दिया कि अगर मैं जीतूंगी तो अपने बल पर, हारूंगी तो अपने बल पर। खरीदी हुई जीत से मुझे हारने में Êयादा खुशी होगी। और मैं चुनाव हार गई! मैं दिल से कहती हूं कि मुझे चुनाव हारने का अफसोस नहीं है, पर अ़फसोस है जनता की गैर-ज़िम्मेदार सोच का।

जाहिर है कि जो लीडर जनता को पैसे देकर वोट खरीदता है, वह जीतने के बाद सैकड़ों-हजारों गुनी ऱकम जनता से ही वसूल करेगा। तब जनता कहेगी कि लीडर भ्रष्ट है, लेकिन लीडर को भ्रष्ट बनाया तो उसी ने है। मेरा मानना है कि देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के लिए हम खुद Êिाम्मेदार हैं, क्योंकि हम खुद भ्रष्ट लोगों को अपना नेता चुनते हैं। खेद की बात यह है कि पॉवरफुल औरतें खुद ही स्त्री-पुरुष समानता के मामले में उदासीन हैं। अपने देश में औरतों को सरकारी सेवा में सेवा-निवृत्ति के बाद पेंशन मिलने का प्रावधान ही नहीं है।

मेरी एक फ्रेंड ने सुप्रीम कोर्ट में इस संबंध में जनहित याचिका दे रखी है, जो पांच साल से कोर्ट में लंबित है। मैं उन सभी पॉवरफुल महिलाओं से निवेदन करती हूं कि वे महिलाओं को भी पुरुषों की तरह पेंशन दिलाने का प्रावधान करवाएं। दूसरे, औरतों के लिए शिक्षा के साथ-साथ चिकित्सा सुविधा भी पूरे देश में फ्री हो। वजह यह कि मध्यम और निम्नवर्गीय परिवार की औरत कभी शर्म के कारण, तो कभी पैसे बचाने के लिए डॉक्टर के पास नहीं जा पाती और बीमारियों का कष्ट चुपके-चुपके सहती रहती है।





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