फील्ड मार्शल महेन्द्र सिंह धोनी ट्वेंटी-20 वर्ल्डकप में सबसे प्रभावशाली कप्तान के रूप में उभरे हैं। संकेत यह है कि टूर्नामेंट में भारतीय टीम की सफलता से उन्हें टेस्ट कप्तान
बनाए जाने की बहस को बढ़ावा मिल सकता है। ज्यादा लोगों को टीम इंडिया के इस वल्र्डकप के सेमीफाइनल में पहुंचने की उम्मीद नहीं थी। यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि सचिन, गांगुली, द्रविड़ और जहीर खान जैसे सीनियर खिलाड़ी टीम में नहीं हैं।
अब टीम फाइनल में पहुंच गई है, तो देश में धोनी व उनके युवा साथियों के लिए उन्मादी लहर सी चल गई है। ऐसे में टेस्ट टीम की कप्तानी के संबंध में चर्चाएं होना स्वाभाविक ही है। चयनकर्ताओं ने टेस्ट कप्तान की नियुक्ति को अगले महीने पाकिस्तान के खिलाफ वनडे सीरीज खत्म होने तक टाल दिया है। आम तौर पर यह समझा जा रहा है कि कप्तान सचिन ही होंगे, लेकिन लगता है कि अब कहानी में नया मोड़ भी आ सकता है।
उदाहरण के तौर पर पूर्व कप्तान सुनील गावसकर ने रविवार को कई अखबारों में छपे अपने लेख में लिखा है कि कप्तानी में विभाजन की अपनी परेशानियां हैं। इसलिए खेल के दोनों ही प्रारूपों के लिए एक ही व्यक्ति को कप्तान बनाना बेहतर विकल्प साबित होगा। गावसकर चयनकर्ता नहीं हैं, लेकिन उनके विचारों को काफी तवज्जो दी जाती है और वे स्पष्ट रूप से धोनी के कठिन परिस्थितियों में बिना परेशान हुए टीम का नेतृत्व करने के गुण से खासे प्रभावित हैं।
एक और पूर्व कप्तान व अपने समकालीन क्रिकेटरों की हमेशा आलोचना करने वाले बिशन सिंह बेदी ने कहा है कि मुझे धोनी का रवैया पसंद है। उसे मालूम होता है कि वह क्या करने जा रहा है। वह आक्रामक निर्णय लेने के लिए तैयार रहता है और परिणाम से कभी विचलित नहीं होता है। दबाव में भी वह काफी शांत रहता है। साथी खिलाड़ियों पर इसका गहरा असर पड़ता है।
पिछले कई मैचों में धोनी ने नेतृत्व क्षमता को साबित किया है। वे टीम को प्रेरित करने वाले कप्तान हैं। उनकी कुशल कप्तानी के कई उदाहरण दिए जा सकते हैं-
* दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ मैच में जब उन्हें महसूस हुआ कि पीठ में खिंचाव के कारण वे पूरी फुर्ती व चुस्ती से विकेटकीपिंग नहीं कर सकेंगे, तो उन्होंने निर्णय लेने में कोई देरी नहीं की और बिना किसी ‘अहम’ के फील्डिंग करने का निर्णय किया और दिनेश कार्तिक से विकेटकीपिंग करवाई।
* ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध मैच में उन्होंने आवश्यकतानुसार आक्रामकता दिखाई और आरपी सिंह व हरभजन सिंह का समुचित उपयोग किया। उन्होंने जरूरत पड़ने पर रक्षात्मक कदम भी उठाया। अंतिम ओवर से पहले का ओवर जोगिंदर शर्मा से कराने के बजाय आरपी सिंह से कराने का निर्णय लिया। उन्होंने आखिरी ओवर में ऑस्ट्रेलिया को 22 रन बनाने का कोई अवसर नहीं दिया।
* युवा और अनुभवी खिलाड़ियों के बीच बेहद खूबसूरती से संतुलन बनाया। उनका सही समय पर भरपूर उपयोग किया। हरभजन सिंह जब गेंदबाजी कर रहे थे, तब हर गेंद से पहले उनसे बात करते रहे और इशारे से आवश्यक ‘संकेत’ व सुझाव भी देते रहे। इससे हरभजन पूरी तरह ‘चार्ज’ रहे। उन्होंने युवराज को भी उपयुक्त सुझाव देने के साथ ही जोगिंदर शर्मा का ‘जोश’ बनाए रखने का सफल काम किया। ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध उनसे गेंदबाजी कराने का साहसिक निर्णय लिया।
*उन्होंने कठिन से कठिन क्षण में भी धैर्य के साथ अपनी मुस्कान बरकरार रखी।
अब पाकिस्तान के विरुद्ध फाइनल मैच में वे टीम को कैसे संचालित और निर्देशित कर फटाफट क्रिकेट में भारत की ‘बादशाहत’ साबित करते हैं, इस पर लोगों की नजरें होंगी। भारत भले ही खिताब हार जाए, लेकिन लंबे बालों और मोटरसाइकिल सवारी के शौकीन धोनी ने करोड़ों क्रिकेटप्रेमियों का दिल तो जीत ही लिया है।