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मनमोहन तय कर लें एटमी करार पर कब आगे बढ़ना है

चंडीगढ़ कांग्रेस-नीत यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन दे रही माकपा के नेता प्रकाश करात ने कहा है कि आस्ट्रेलिया और जापान जैसे देश भी अमरीका का साथ दे रहे हैं, लेकिन उनके अपने लोगों में इसका व्यापक विरोध है।

जापान के प्रधानमंत्री इस मामले में इस्तीफा दे चुके हैं। आस्ट्रेलिया में नवंबर में चुनाव हैं और वहां भी सरकार का जाना तय है। खुद अमरीका के राष्ट्रपति के दिन भी गिनती के हैं। ऐसे में परमाणु समझौते पर आगे बढ़ना है कि नहीं, यह प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह को तय करना है। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस प्रकार 1963 में परमाणु समझौते के तहत अमरीका भारत को ब्लैकमेल करता आया है, अब भी होगा।

समझौता 6 माह टालने की सलाहकरात ने भारत-अमरीका एटमी करार मामला छह महीने के लिए टालने की सलाह दी है। उन्होंने पार्टी नेताओं से कहा, इस मुद्दे को जनता में लेकर जाएं और समझाएं कि किस प्रकार केंद्र ने भारत की संप्रभुता को तिलांजलि दी है। पार्टी द्वारा परमाणु मुद्दे पर देशभर में करवाई जा रही संयुक्त कन्वैंशनों की श्रंखला में रविवार को यहां कन्वैंशन करवाई गई, जिसमें इस मुद्दे पर प्रकाश करात खुलकर बोले।

उन्होंने कहा, जुलाई 2005 में अमरीका गए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के साथ मीटिंग के बाद जो संयुक्त बयान आया था उसमें चार महत्वपूर्ण पहलुओं को लाया गया था और चारों ही भारत की संप्रभुता के खिलाफ थे।

अल्पमत में होने के बावजूद कांग्रेस ने परमाणु मुद्दे को आगे बढ़ाया क्योंकि उस पर अमरीका का दबाव था। संसद में दो-तिहाई सांसद इस मुद्दे के विरोध में हैं। उन्होंने भाजपा पर दोहर मापदंड अपनाने का आरोप लगाया और कहा कि उन्होंने जानबूझकर संसद में इस मुद्दे पर बहस नहीं होने दी क्योंकि उन पर भी अमीरका का दबाव है।

विदेश नीति नहीं रहेगी स्वतंत्रकरात ने कहा कि समझौते के चार पहलुओं आर्थिक, राजनीतिक, सैन्य और परमाणु गठबंधन को आगे बढ़ाया जा रहा है जिससे हम विदेश नीति में स्वतंत्र नहीं रहेंगे और हमारी नीति अमरीका तय किया करगा। बिजली की कमी दिखाकर केंद्र सरकार इस मुद्दे पर आगे बढ़ रही है जबकि हम अपने यूरेनियम भंडारों से सस्ती परमाणु ऊर्जा पैदा कर सकते हैं लेकिन अमरीका नहीं चाहता कि हम अपनी तकनीक को विकसित करें।

इसके अलावा ऊर्जा के संसाधनों को बढ़ाने के लिए हमारा ईरान के साथ गैस पाइप लाइन बिछाने का समझौता हो चुका है इसलिए भी अमरीका परमाणर्ु ईधन लेने के लिए हम पर दबाव डाल रहा है। यदि ऐसा हुआ तो गैस पाइप लाइन समझौता खत्म हो जाएगाहाइड एक्ट में छिपा है काफी कुछकामरड करात ने कहा कि इस मामले के हाइड एक्ट में साफ लिखा है कि भारत और अमरीका की विदेश नीति साथ-साथ चलनी चाहिए। ईरान को अलग-थलग करने के लिए भी सहयोग की मांग है। दिलचस्प बात यह है कि भारत इस नीति पर कितना आगे बढ़ा है इसके बार हर साल यूएस प्रैसीडेंट अपनी संसद को रिपोर्ट देंगे जबकि भारतीय संसद को रिपोर्ट देने का कोई प्रावधान नहीं है।

बिजली उत्पादन पर क्यों घटाया बजट?परमाणु मुद्दे पर बोलने वाले अन्य सदस्यों ने इस बात पर जोर दिया कि जब देश में बिजली का संकट है तो उत्पादन में खर्च कम क्यों किया गया। बताया गया कि सातवीं पंचवर्षीय योजना में जहां 21 हजार मैगावाट उत्पादन का लक्ष्य था वहीं आठवीं में 16, नौवीं में 18 और दसवीं पंचवर्षीय योजना में 20 हजार मैगावाट का लक्ष्य रखा गया। वक्ताओं ने कहा कि अपने यहां की यूरेनियम खदानों को खोलने पर खर्च करना पिछले लंबे समय से बंद कर दिया गया है। कई सालों बाद इस वर्ष मात्र एक हजार करोड़ रुपए रखे गए हैं।





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