अभिव्यक्ति.
यह पराजय पाकिस्तान के लिए शर्मनाक नहीं है, भले ही वह अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंदी भारत से हारा है। शोएब मलिक और ज्योफ लॉसन ने पाकिस्तान को विश्व क्रिकेट में एक ताकत के रूप में पुनर्प्रतिष्ठापित किया है। यह पाकिस्तानी क्रिकेट नया युग है जो नई ऊर्जा, नए आवेग, अनुशासन और रोमांच के साथ शुरू हो रहा है।
सबसे महत्वपूर्ण यह है कि एक साल से तरह तरह के विवादों से जूझ रही पाकिस्तान क्रिकेट के सम्मान को बहाल करते हुए शोएब मलिक की नौजवान टीम पहले ट्वेंटी-20 विश्वकप के फायनल तक पहुंचने में कामयाब रही। 
बहरहाल फायनल के रोमांच को चिर-प्रतिद्वंद्वी भारत-पाकिस्तान के मुकाबले ने जिस तरह सातवें आसमान में पहुंचा दिया शायद उसकी कल्पना भी किसी ने न की होगी। क्रिकेट के ट्वंटी-20 का यह रूप जब सामने आया तो पाकिस्तानी बल्लेबाजों की मानसिकता के हिसाब से इसे सबसे मुफीद माना गया था, लेकिन पाकिस्तान के गेंदबाज इस टूर्नामेंट में सितारे बनकर चमके।
पाकिस्तान में ऐसे गेंदबाजों का युग फिर से लौटा है जो टीम को किसी भी कठिन प्रतिस्पर्धा में टिकाए रहने के लिए सक्षम हैं। पिछले कुछ सालों से ऐसा देखने में आ रहा था कि गेंदबाजी का आक्रमण बिखरा-बिखरा सा है। ज्योफ लॉसन के आने के बाद गेंदबाजों ने अपना राडार खोज लिया है और इसी क्षमता ने पाकिस्तान को फायनल तक पहुंचाया।
पूरे टूर्नामेंट में उमर-गुल कमाल के गेंदबाज साबित हुए। उनमें तेज गेंदबाजी की पुरानी धार देखने को मिली। पाकिस्तानी टीम के लिए रनों का लक्ष्य मुश्किल नहीं था, बल्लेबाजों का यह खयाल रहा होगा कि मैच तो आधे समय में ही जीत लेंगे।
लेकिन भारत ने जिस तरह अप्रत्याशित गेंदबाजी के साथ मोर्चा संभाला पाकिस्तानी बल्लेबाज मानसिक रूप से टूट गए। दो अहम फैसलों ने मैच का रुख भारत की ओर मोड़ दिया। यूनिस की रन लेने की जल्दबाजी में इमरान नजीर का रन आउट होना और दूसरा इरफान पठान की गेंद का शाहिद अफरीदी द्वारा सही आकलन न कर पाना।
और अंतत: क्रिकेट में ऐसे ही रोमांचक क्षणों में हीरो की दरकार होती है। मिस्बाह-उल-हक ने इसे गंवा दिया। मियांदाद के खाते में ऐसा ही क्षण सुनहरे हर्फो में टंका है। इस टूर्नामेंट में पाकिस्तान के आधार स्तंभ रहे मिस्बाह अपने आत्मघाती शॉट के लिए शायद ही खुद को कभी माफ कर पाएं। बस चार गेंद में छह ही तो बनाने थे।
-लेखक पाकिस्तान के प्रमुख अखबार डॉन के टिप्पणीकार हैं।