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खेल में युद्ध का रोमांच

दृष्टिकोण. singh ट्वेंटी-20 वल्र्ड कप के फाइनल में रोमांचक घमासान के बाद भारत के जाबांज सिपाहियों ने पाकिस्तान पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। उत्तेजित दिल की धड़कन सामान्य होने पर याद आया कि अभी कुछ वर्ष पूर्व तक पाकिस्तान के साथ क्रिकेट के मैदान पर मुकाबले को लेकर ‘टू बी ऑर नॉट टू बी’ जैसी स्थिति बन जाती थी।

जब भी किसी देश के साथ युद्ध जैसी मनोस्थिति बनती है तो यह दुविधा हमेशा सामने खड़ी हो जाती है। वर्ष 1980 के मास्को ओलंपिक का पश्चिमी देशों द्वारा सोवियत यूनियन के अफगानिस्तान पर आक्रमण के कारण बहिष्कार किया गया था। सोवियत संघ और उसके समर्थक राष्ट्रों ने इसका बदला 1984 के लास एंजेलिस के ओलंपिक खेलों में चुका दिया था।

सच यह है कि खेलों और युद्ध का प्राचीन और गहरा संबंध है। आधुनिक फुटबाल का विकास तो बर्फ और ठंड भरे लंबे शरद काल में सैनिकों को शारीरिक रूप से युद्ध के लिए तैयार रखने के लिए ही इंग्लैंड और यूरोप के अन्य देशों में हुआ था। महाभारत काल में राजाओं द्वारा सभाओं का आयोजन किया जाता था जिसमें मल्ल युद्ध से लेकर रथों की दौड़ तक आयोजित की जाती थी।

पिछली शताब्दी के प्रथम महायुद्ध के पश्चात तो खेल राष्ट्रों द्वारा अपना वर्चस्व स्थापित करने का साधन बना लिया गया था। हिटलर के नाजी जर्मनी ने तो 1936 के बर्लिन ओलंपिक खेलों के माध्यम से आर्य जाति की श्रेष्ठता को सिद्ध करने का प्रयास किया था हालांकि अमेरिका के काले धावक जेस्सी ओवंस ने चार स्वर्ण पदक, जिसमें सबसे तेज धावक और लंबी कूद का पदक भी शामिल था, जीतकर रंग में भंग डाल दिया था।

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अमरीका और सोवियत यूनियन शीत युद्ध में इसलिए उलझे रहे क्योंकि वह जानते थे कि यदि उन्होंने अपने मतभेदों का फैसला युद्ध में करने का प्रयास किया तो नरसंहार होगा। इसीलिए उन्होंने खेल के मैदानों को ही समरभूमि बनाया। सोवियत यूनियन पर यह आरोप भी लगता रहा कि आर्थिक रूप से पश्चिमी जगत से पिछड़े होने की कमी को उसके द्वारा खेल के मैदान में पूरा किया जाता रहा।

सोवियत यूनियन की आइस हाकी टीम का भी अमरीका पर दशकों तक दबदबा था और अंतत: जब 1980 की अमेरिका की एक युवा टीम ने उसे हराया तो उस घटना पर कर्ट रसल द्वारा अभिनीत ‘मिराकल’ फिल्म बनाई गई जिसे खेलों पर बनाई गई सभी फिल्मों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

ऐसे में यदि यह कहा जाए कि आधुनिक मानव की सभ्यता के विकास की कथा को युद्ध से खेल के मैदान की ओर जाने की यात्रा कहा जाना चाहिए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। पिछली शताब्दी में खेल युद्ध का विकल्प बने। दोनों ही क्षेत्रों में योद्धाओं का शारीरिक रूप से बलवान होना आवश्यक था। cricket

दोनों क्षेत्रों में मैदान पर उतरने वाले व्यक्ति साहस पर निर्भर करते हैं और दोनों ही एक-दूसरे की कमजोरियों के लिए उसे बिना किसी दया के दंडित करते हैं। आधुनिक खेल एक ऐसे युद्ध बने जिसमें प्रतिद्वंद्वी एक-दूसरे पर घातक प्रहार नहीं करते और न ही वह पूर्व निर्धारित नियमों और सीमाओं के बाहर जाते हैं लेकिन मनुष्य की आक्रामक और हिंसक भावनाओं को परिमार्जित रूप से अभिव्यक्त कर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के अवसर का लाभ उठाते हैं।

जहां तक भारत और पाकिस्तान के क्रिकेट मैचों का सवाल है तो यह याद रखना चाहिए कि कुछ वर्ष पूर्व ही इनके आयोजन पर इसलिए आपत्ति की जाती थी क्योंकि हमारा मानना है कि कश्मीर में पाकिस्तान द्वारा परोक्ष युद्ध लड़ा जा रहा है। इसी कारण ‘खेलें या न खेलें’ की मनोस्थिति बन जाती थी। कारगिल युद्ध के उपरांत 1999 के इंग्लैंड में आयोजित विश्व कप में खेलने की मजबूरी यदि न होती तो संभवत: भारत उसमें हिस्सा न लेता।

परंतु प्रतिबद्धता के कारण वह मैच हुआ और जब भारत ने जीत दर्ज की तो तत्कालीन खेल मंत्री ने गदगद स्वर में टिप्पणी की थी, ‘इस विजय से मानो कारगिल की जीत पर मोहर लग गई है।’ हर भारतीय के आज भी यही उद्गार हैं। खेल के मैदान में बहाए गए पसीने से दर्ज की गई जीत से कश्मीर और आतंकवादी घटनाओं से आए दिन बहने वाले खून के रिसाव की गति थोड़ी धीमी पड़ती है।

दक्षिण अफ्रीका के मैदान पर दर्ज की गई जीत से भारत ने वर्ष 2003 के विश्व कप से लेकर इस वर्ष तक के सभी जख्मों पर मरहम लगा ली है पर राष्ट्रीय भावनाओं से परे इस बात पर भी विचार करना जरूरी है कि क्या आज खेल प्रेमियों और विशेषकर मीडिया का दुलारा ट्वंटी-20 युद्ध के विकल्प के रूप में उभरकर सामने आया है या फिर इसकी जगह केवल मनोरंजन के क्षेत्र तक ही सीमित है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि यह खेल युवाओं का खेल है। रिकी पोंटिंग, माइकल हसी, शेन वाटसन, वीरेन्द्र सहवाग, मोहम्मद आसिफ और इमरान नजीर की मासपेशियों में आई चोट इस बात का सबूत है। एरोबिक और एनारोबिक व्यायाम पद्धति के अद्भुत मिश्रण से खेले गए इस तेज गति के खेल में किसी भी खिलाड़ी के लंबे समय तक टिके रहने की संभावना नहीं है।

शायद यही रफ्तार और नित नए खिलाड़ियों का उभरना इस मीडिया को भा रहा है जो उड़ीसा के समुद्र तट पर रेत से मूर्तियां बनाने वाले कलाकारों की तरह हर दिन एक नए नायक को बनाता और बिगाड़ता है। आज की तेज रफ्तार जिंदगी में हर रोज कुछ नया चाहिए जिस कारण यदि स्थान के अभाव में पुराने को तोड़ना पड़े तो किसी को कोई आपत्ति नहीं होती।

इस सदी में खेल मनोरंजन का साधन तो है और वह हमारी राष्ट्रीय चेतना का एक हिस्सा भी है परंतु पिछली शताब्दी की तरह वह हमारे राष्ट्रीय अस्तित्व को बनाए रखने के लिए अब अनिवार्य नहीं है।

-लेखक वरिष्ठ टिप्पणीकार तथा यूजीसी की पुस्तक ‘खेल पत्रकारिता’ के रचयिता हैं।





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