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वैज्ञानिकों ने रामसेतु तोड़ने का विरोध किया

भोपाल. रामसेतु का ऊपरी हिस्सा मानव निर्मित है और यह रामायण काल में ही बना है। सुप्रसिद्ध भूगर्भशास्त्री डा. एमके खन्ना ने मंगलवार को एक संगोष्ठी में यह बात कही। संगोष्ठी में शामिल अन्य वैज्ञानिकों ने भी रामसेतु को तोड़ने का विरोध किया।

करोड़ों वर्ष पूर्व एक ही धरती थी लंका व भारत: विज्ञान के क्षेत्र में कार्यरत स्वयंसेवी संगठन साइंस सेंटर (ग्वालियर) द्वारा आईकफ आश्रम में आयोजित संगोष्ठी के मुख्य वक्ता भूजल सर्वेक्षण मप्र के सेवानिवृत्त संचालक डा. एमके खन्ना ने कहा कि नासा से प्राप्त इमेज और साफ्टवेयर से यह जानकारी मिलती है कि रामसेतु का ऊपरी हिस्सा 5076 वर्ष पुराना है। यही काल राम-रावण युद्ध का है।

डा. खन्ना ने कहा कि लंका व भारत करोड़ों वर्ष पूर्व एक ही धरती थी। बाद में जमीनी हलचलों के कारण लंका, भारत से अलग होता गया। रामसेतु के नाम से उपलब्ध संरचना का एक भाग इसी जमीनी हलचल का परिणाम है, जिस पर राम ने अपने इंजीनियर नल और नील की मदद से पुल निर्माण किया होगा। उन्होंने कहा कि यह कहना कि रामसेतु का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, विज्ञान का मखौल उड़ाने के समान है।

यह दूसरी बात है कि रामसेतु की निर्माण प्रक्रिया पर और अधिक शोध की जरूरत है। जीवाजी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा. राधारमण दास ने कहा कि सेतु समुद्रम योजना से जहाजरानी कंपनियों के मालिकों को तो मुनाफा हो सकता है, लेकिन तटीय क्षेत्र के हजारों लोग बेरोजगार हो जाएंगे। इस परियोजना से समुद्रीय जैव विविधता का जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई संभव नहीं होगी।

रामसेतु वैश्विक धरोहर है:
संस्था के सचिव अरुण भार्गव ने कहा कि रामसेतु वैश्विक धरोहर है, इसकी रक्षा की जानी चाहिए। इंडियन साइंस कांग्रेस भोपाल चेप्टर के अध्यक्ष डा. एसके कुलश्रेष्ठ ने बताया कि विख्यात वैज्ञानिक सर जूलियन हक्सले ने रामसेतु क्षेत्र को बायोलाजिस्ट का स्वर्ग बताया था, जिसे सेतुसमुद्रम परियोजना नष्ट कर देगी।

जूलाजिकल सर्वे आफ इंडिया, कोलकाता के सेवानिवृत्त निदेशक डा. केके तिवारी ने संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए भारतीय वैज्ञानिकों से अपील की कि वे आगे आएं और इस मामले में भारतीय समाज का नेतृत्व करें।

संगोष्ठी को साइंस सेंटर की राज्य समन्वयक संध्या वर्मा, रवींद्र मुरहार, वीके गुप्ता और वीरेंद्र चौधरी ने भी संबोधित किया। संगोष्ठी में यह निर्णय भी लिया गया कि रामसेतु पर उपलब्ध वैज्ञानिक तथ्यों को सरल हिंदी भाषा में प्रकाशित किया जाएगा। दीपक सोनी ने आभार व्यक्त किया।

रेत और पत्थर से बना है रामसेतु
संगोष्ठी में बताया गया कि रामसेतु पुल की कुल लंबाई लगभग 30 किमी है। इनमें से कुछ हिस्सों में ड्रिलिंग की गई, तो पहले 3-4 मीटर तक रेत मिली। इसके बाद तीन मीटर तक कांगलेमरेटे सेंड स्टोन, कोरल के गोल पत्थरों के अवशेष मिले।

इसके नीचे यानी सात मीटर नीचे समुद्री रेत मिली। यह चीजें पांच हजार साल पहले समुद्री क्षेत्रों में निर्माण सामग्री जैसी हैं। यह इस बात का सबूत है कि इन हिस्सों पर मानव गतिविधियां ही हुई हैं।





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A.K.Gupta
Wednesday, 26th Sep 2007, 11:45
Feelings of real scientists should be conveyed to certain dumb , senseless and selfish politicians , bussey to upgrade their immoral carrear.With great distress and disgrace I am interrested in knowing from the politicians opposing RAM and RAMSETU ,to name the engineers responsible for the construction of taj and so many other monuments.
shyam garg
Wednesday, 26th Sep 2007, 21:30
i support that ram setu should be kept as it is and should do research
surender
Saturday, 29th Sep 2007, 11:15
UPA govt. should quit their openion hurt the sentiments of HINDUES