अभिमत. पाकिस्तान क्रिकेट टीम के कप्तान शोएब मलिक ने ट्वेंटी-20 विश्व कप के पुरस्कार वितरण समारोह में उनकी टीम का समर्थन करने के लिए दुनिया के सभी मुसलमानों का आभार व्यक्त करने के बयान को अब अपनी गलती स्वीकार कर ली है। विवादास्पद बयान देते वक्त मलिक की जबान वाकई फिसली थी या यह उनकी सोची-समझी मजबूरी थी, इस पर बारीकी से और उस दुनिया को समझते हुए परीक्षण किए जाने की जरूरत है जिसमें पाकिस्तान रहता है। मलिक को पता होना चाहिए कि दुनियाभर के मुसलमान पाकिस्तान और उसकी क्रिकेट टीम के समर्थक नहीं हैं।
पिछले कुछ वर्षो के दौरान पाक टीम की संरचना में बदलाव आया है और अब वह एक कॉस्मोपोलिटन टीम नहीं रही, जैसी कभी हुआ करती थी। हालांकि पाक टीम में हिंदू और ईसाई खिलाड़ी रहे हैं, मगर हाल ही के सालों में धर्म के खुले प्रदर्शन के प्रति टीम का रुझान बढ़ा है। टीम के पुराने खिलाड़ियों ने ऐसे झुकावों के खिलाफ संकेत दिए थे। हमें यह समझने की जरूरत है कि पाकिस्तान में असुरक्षा की यह भावना लोगों के जीवन का अंग बन चुकी है।
भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में मलिक का बयान असामान्य, गैरजरूरी और अपमानजनक माना गया। देश में इस बयान को लेकर जो नाराजी थी वह स्वाभाविक है। फिर भी, सही प्रतिक्रिया इसकी अनदेखी करना ही होती। आखिरकार फाइनल के मैन ऑफ द मैच भारत के इरफान पठान ही थे। इरफान इसलिए भारत की टीम में नहीं हैं कि एक मुसलमान हैं, बल्कि इसलिए हैं कि वे एक बेहतरीन क्रिकेटर हैं। पूरा भारत इस बात को जानता है। भारतीय टीम की जीत पर पूरे मुल्क ने जश्न मनाया, धर्म, जाति, लिंग और उम्र के भेदभाव के बिना। टीम की जीत और देश के सिद्धांतों के प्रति अधिक जज्बाती हुए बिना हम अपने बहुलतावादी समाज का जश्न मना सकते हैं, जो हमें अपनी धार्मिक या सामाजिक पहचान के बिना क्रिकेट मैच जीतने का मौका देता है।