सम्पादकीय. मुंबई शेयर बाजार का संवेदी सूचकांक अगर पांच दिन में एक हजार अंक चढ़ गया है, तो यह रिकॉर्ड महज सांख्यिकी नहीं है। यह दुनियाभर के प्रमुख निवेशकों की नजर में भारतीय अर्थव्यवस्था की संभावनाओं का संकेत भी है। यह इस बात की भी तसदीक करता है कि भारतीय पूंजी बाजार भले ही पूर्ण विकसित नहीं हुआ हो, फिर भी वह राजनीतिक अनिश्चितताओं को पचा सकने का दम-खम रखता है और सकारात्मक आर्थिक घटनाओं का नोटिस भी ले सकता है। यह तकरीबन वैसी ही घटना है जो ब्राजील, चीन और रूस जैसे उभरते बाजारों में हो रही है। यह अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजार में लगने वाले धन के बहाव की दिशा भी बताता है। अब तक 95 फीसदी अमेरिकी ही नहीं बल्कि जापानी भी अपनी बचत का बड़ा हिस्सा अमेरिकी फंडों और शेयरों में लगाते रहे हैं। पर अब उनका नजरिया बदला है और वे अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं की ओर रुख करने लगे हैं। वियतनाम के पूंजी बाजारों ने तो पिछले साल 150 फीसदी तक के रिटर्न दिए हैं।
सूचकांक की इस तेज रफ्तार यात्रा का रहस्य यह है कि एक साथ कई घटनाएं ऐसी हुई हैं जो सेंसेक्स को मजबूती दे रही हैं। जहां अमेरिकी बाजार में मुनाफा घटने के कारण विदेशी निवेशक बड़ी मात्रा में धन भारत ला रहे हैं, वहीं रिजर्व बैंक ने विदेश में निवेश की सीमाएं बढ़ाकर डॉलर के बाहर निकलने के रास्ते खोल दिए हैं। यह सवाल जरूर पैदा होता है कि जब मुनाफा भारतीय बाजार में ज्यादा दिखाई दे रहा है, तो कोई विदेश में निवेश करने क्यों जाएगा। फिर भी रिजर्व बैंक का यह कदम डॉलर प्रवाह से रुपए पर बढ़ते दबाव को कुछ कम करेगा। रुपए की मजबूती का सिलसिला रुक जाता है, तो आईटी सेवा निर्यातकों, कपड़ा व उन निर्यातकों को राहत मिलेगी, जो कच्चे माल का आयात नहीं करते हैं। कंपनियों को अपना कामकाज सुधारना होगा और अंतरराष्ट्रीय बाजार में ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनकर उभरना होगा।
छोटे निवेशकों को यह नहीं भूलना चाहिए कि पूंजी बाजार में जब मुनाफा तेजी से बढ़ता है, तो उसके जोखिम भी बड़े होते हैं। अर्थव्यवस्था की 9 फीसदी विकास दर, कंपनियों के अच्छे मुनाफे और मुद्रास्फीति की सामान्य दर ऐसे कारक हैं, जो सेंसेक्स के 18000 की तरफ जाने का इशारा तो करते हैं, लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भारतीय इक्विटी का मूल्य पहले ही काफी ज्यादा आंका जा चुका है और तमाम संभावनाओं के बावजूद इसकी कोई तो सीमा होगी ही।