भोपाल. भोज मुक्त विश्वविद्यालय के वित्तीय हिसाब में 35 करोड़ रुपए से ज्यादा की गड़बड़ियां पाई गई हैं। शासन के स्थानीय निधि संपरीक्षा विभाग ने चार माह में इन गड़बड़ियों का जवाब विश्वविद्यालय से मांगा है। हाल ही में जारी की गई विवि की आडिट रिपोर्ट में कुल 35 गड़बड़ियों का खुलासा किया गया है। दिसंबर 2006 से मार्च 2007 तक चले लेखा रिकार्ड के परीक्षण की रिपोर्ट में सामने आए ज्यादातर घोटाले निर्माण कार्र्यो और खरीदी के हैं। इस रिपोर्ट की प्रति शासन ने राजभवन को भी भेजी है।
भोज विश्वविद्यालय में आर्थिक अनियमितताओं की कई शिकायतें राजनीतिक और सामाजिक संगठनों द्वारा पहले से ही की जा रही थीं। अब शासन ने भी यहां वर्ष 2004 से 2006 के बीच कई गंभीर गड़बड़ियां पाई हैं। स्थानीय निधि संपरीक्षा विभाग की रिपोर्ट में कई चौंकाने वाली गड़बड़ियां उजागर की गई हैं। गौरतलब है कि इन्हीं घपलों में से ज्यादातर की जांच पहले ही राज्यपाल डॉ. बलराम जाखड़ द्वारा जस्टिस एसके चावला से कराई जा रही है।
आडिट रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2004 में विवि में प्रवेश दिए गए छात्रों की फीस 11 करोड़ जमा की गई, जबकि छात्र संख्या के अनुसार से हिसाब लगाने पर यह राशि 18 करोड़ से भी ज्यादा जमा की जानी थी। इस बारे में विवि से स्पष्टीकरण मांगा गया तो बताया गया कि फीस के बैंक ड्राफ्ट में गलतियां थी, इसलिए बैंक ने वापस कर दिए, जो नवीनीकरण के बाद विवि को मिले ही नहीं। अब इन ड्राफ्ट्स को दोबारा स्टडी सेंटर्स से मंगाए जाने को कहा गया है। इसके साथ विवि के निर्माण कार्यों में निजी ठेकेदारों को किए गए करोड़ों रुपए के अनियमित भुगतान पर भी सवाल उठाए गए हैं। यहां तक कि कई निर्माण कार्यों के लिए संबंधित संस्थाओं की अनुमति न लिया जाना भी सामने आया है।
यह तो आपत्तियों के कुछ उदाहरण हैं। ऐसी ही 37 गड़बड़ियां शासन ने ढूंढ निकाली हैं, जिनके जवाब में विवि प्रशासन कोई ठोस उत्तर नहीं दे सका और यहां तक कि कई संबंधित दस्तावेज भी प्रस्तुत नहीं किए जा सके। गड़बड़ियों की गंभीरता को आंकने के लिए यहां यह बताना जरूरी है कि बिना निविदा खरीदी गई करीब तीन करोड़ रुपए की पाठ्य सामग्री की कोई रसीद, मांगपत्र, कार्य आदेश या चालान आदि भी विवि के रिकार्ड में नहीं पाए गए। जिससे इस आडिट टीम इस भुगतान का सत्यापन ही नहीं कर सकी। अब अगले परीक्षण तक ऐसे सभी दस्तावेज उपलब्ध कराने को कहा गया है।
कई मामलों में अंदर तक गड़बड़ी..
परीक्षण दल को एक-एक मामले की जांच के दौरान उससे जुड़े कई अकादमिक और प्रशासनिक घपले भी मिले। जैसे छात्रों की फीस का हिसाब लगाने में पता चला कि विवि में छात्र पंजीयन का कोई रिकार्ड नहीं है, विद्यार्थी सहायता और लेखा में जमा फीस का वार्षिक मिलान नहीं किया गया। इसके अलावा विवि में संविदा नियुक्तियों में किए गए 29 लाख रुपए के अनियमित भुगतान के परीक्षण में पता चला कि परिनियम का उल्लंघन करके सेवावृद्धि भी दी गई। ऐसे सभी घपलों का खुलासा इस रिपोर्ट में करते हुए विवि से स्पष्टीकरण मांगा गया है और अगले परीक्षण तक इन्हें ठीक करने को भी कहा गया है।
गंभीर आपत्तियां..
शासन ने अपनी रिपोर्ट में पांच घोटालों पर गंभीर आपत्ति ली है। इनमें बैंक ड्राफ्ट न मिलना, फीस की राशि में अंतर, संविदा कर्मचारियों के भुगतान, निर्माण कार्र्यो में निजी ठेकेदारों से वसूली न होना और गेस्ट हाउस में निर्माण करवाना शामिल है।
फाइलें ही नहीं मिलीं..
करीब चार महीने तक लगातार चले आडिट के बावजूद कई ऐसे मामले सामने आए, जिनकी फाइलें भी विवि के पास नहीं थीं। इनमें अधिकारियों की सेवा पुस्तिकाएं, मुद्रण की कार्रवाई की मूल नस्ती, निर्माण कार्यों की मूल नस्तियां जैसी करीब दस मामलों की फाइलें विवि ने परीक्षण दल को नहीं दीं।
* विवि को इन सभी आपत्तियों का निराकरण करने के लिए चार महीने का समय दिया गया है। सभी दस्तावेज उपलब्ध न होने पर संपरीक्षा की कंडिकाओं के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
मनोज कुमार, उप संचालक, स्थानीय निधि संपरीक्षा
कुछ बड़े घोटाले..
* दो करोड़ 98 लाख 44 हजार 574 रुपए के बिना निविदा प्रकाशन कार्य।
* तीन लाख 58 हजार 580 रुपए के डिमांड ड्राफ्ट जमा नहीं किए गए।
* तीन करोड़ 19 लाख 69 हजार 224 रुपए छात्रों की फीस में कम निकले।
* 29 लाख 13 हजार 133 रुपए संविदा कर्मचारियों को वेतन के अलावा दिए गए।
* एक लाख 44 हजार रुपए एक संविदा कर्मचारी को अनियमित भुगतान।
* एक करोड़ 40 लाख 50 हजार रुपए विधायक निधि का उपयोग नहीं, वापस भी नहीं की।
* 27 लाख 38 हजार और तीन लाख 39 हजार 242 रुपए का रोड-ब्रिज निर्माण में अनियमित भुगतान।
*15 लाख 83 हजार रुपए के किराए के गेस्ट हाउस में निर्माण कार्य।
* 14 लाख 58 हजार 655 रुपए की किताबें-स्टेशनरी बिना निविदा खरीदी।
* 72 हजार रुपए में 96,000 पेजों की फोटो कापी पर निर्थक खर्च।