Manoranjan
Cinema
Bollywood Bollywood मुंबई. इस साल के लिए ऑस्कर एंट्री चुने जाने के बा एक बार फिर चयन प्रक्रिया में बदलाव की जरूरत महूसस होने लगी है क्योंकि जब तक सक्रिय फिल्मकार, आलोचक और फिल्म से जुड़े सरकारी नुमाइंदे पूरी चयन प्रक्रिया को जिम्मेदारी और गंभीरता से नहीं लेते तब तक गलत चयन होते रहना सामान्य बात है और ऑस्कर का भारत के खाते में आना सिर्फ एक सपना ही।
कैसे होता है चयन :
- ऑस्कर के लिए आधिकारिक प्रविष्टि के चयन का जिम्मा फिल्म संबंधी 34 संस्थाओं की प्रमुख फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया के पास है।
- एफएफआई द्वारा 10 से 12 निर्माताओं की संस्था से नामांकन मांगती है।
- ऑस्कर द्वारा नामांकन की डेडलाइन नवंबर है इसलिए अक्टूबर तक एंट्री भेज दी जाती है।
इसके बाद चयन के वक्त जो बातें ध्यान रखी जाती हैं उनमें :
- फिल्म के निर्माण का स्तर।
- फिल्म की गुणवत्ता, मौलिकता और संदेश।
- निर्णायक मंडल की सोच और मत।
इस साल की चयन समिति :
एफएफआई द्वारा बनाई जाने वाली 10 निर्णायकों की इस समिति में अक्सर एक-दो को छोड़कर बाकी सभी लोग फिल्मों से तो जुड़े होते हैं लेकिन मुख्यधारा की फिल्मों से नहीं। इस साल ज्यूरी के अध्यक्ष रहे फिल्म निर्देशक विनोद पांडे और एक मुख्य सदस्य फिल्म निर्देशक सुधीर मिश्रा। इनके अलावा :
निर्देशक अनिल शर्मा, कैमरामेन नदीम खान, लेखक जलीस शेरवानी, संपादक रंजीत बहादुर, निर्माता रवि कोट्टारकारा, संगीतकार रवि शर्मा, निर्देशक जगदीश शर्मा, परिधान डिजाइनर शाहिद अमीर और निर्माता बिजॉय कल्याणी।
विडंबना :
दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्मों का निर्माण करने वाले भारत के इतिहास में 50 के दशक की शुरुआत से ऑस्कर के लिए प्रविष्टियां भेजी जा रही हैं लेकिन आज तक केवल तीन फिल्मों महबूब खान की मदर इंडिया (1957), मीरा नायर की सलाम बॉम्बे (1988) और आमिर खान की लगान (2001) ने ही टॉप 5 फिल्मों में जगह बनाई है। हालात देखे जाएं तो मैक्सिकों और बेल्जियम जैसे छोटे देशों ने भी अब तक पांच-पांच बार नामांकन हासिल किया है। फ्रांस तो 30 से ज्यादा बार नामांकन पा चुका है और 10 बार पुरस्कार जीत भी चुका है। यहां तक कि 2001 में ताईवानी निर्देशक एंग ली की फिल्म क्राउचिंग टाइगर हिडन ड्रैगन ने 10 नामांकन हासिल किए थे और 4 जीते भी थे।
बदलाव के बारे में :
कुछ फिल्ममेकरों का मानना है कि हमारे देश में चयन प्रक्रिया को बदला जाना चाहिए। इससे भारत के दावे को और प्रबल बनाया जा सकता है। फिल्म प्रोडच्यूसर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष अमित खन्ना ने एक बार कहा था कि आलोचना तो होगी ही, कोई भी ज्यूरी क्यों न हो। लेकिन, बात यह है कि जो लोग इस पूरे मामले में किसी भी रचनात्मक तरह से नहीं जुड़े हैं, उन्हें आलोचना करने का अधिकार नहीं होना चाहिए।
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