Manoranjan
Cinema
Bollywood Bollywood मुंबई. वेनिस फिल्म फेस्टिवल में निर्देशक भावना तलवार की फिल्म धर्म को काफी तारीफ मिली और डैनी हॉस्टन व माइकल योह जैसे दिग्गजों ने फिल्म को सराहा। इसके बाद इस फिल्म को ऑस्कर की नजदीकी सीढ़ी कहे जाने वाले पाम स्प्रिंग्स फेस्टिवल में भी दिखाया गया। बात यह नहीं है कि इतने महत्वपूर्ण पायदानों पर पहुंची फिल्म को दरकिनार किया गया।
महत्वपूर्ण सवाल यह है कि ऐसी फिल्मों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भेजने से क्या संदेश और क्या छवि बॉलीवुड की बनती है? भावना का तर्क सटीक दिखता है कि उस स्तर पर क्या हम यह सुनना चाहते हैं कि हमें फिल्म बनाने की तमीज नहीं है। बड़े बजट और बड़ी स्टारकास्ट के अलावा एकलव्य के पास रिझाने के लिए और क्या है? यह भावना का मत भी हो सकता है लेकिन इसे अगर तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो वाकई सही भी है।
पहले भी हुए विवाद :
1. संजय लीला भंसाली निर्देशित अमिताभ और रानी स्टारर ब्लैक के बजाय उस साल अमोल पालेकर निर्देशित शाहरुख और रानी स्टारर पहेली को ऑस्कर एंट्री के रूप में भेजा गया था। उस समय भी ज्यूरी के सुधीर मिश्रा ने कहा था कि पहेली में भारतीय तत्व ज्यादा हैं और यह भारत के मानस को बेहतर तरीके से प्रदर्शित करती है। हालांकि यह भी कहा जा रहा था कि ब्लैक हॉलीवुड की फिल्म से प्रेरित है इसलिए मौलिकता की दृष्टि से पहेली के चयन पर कुछ ही देर में विवाद शांत हो गया।
खास बात : एक खेमा यह सवाल तो अब भी कर सकता है कि अगर गॉडफादर से प्रेरित मणि रत्नम की फिल्म नायकन को एक बार ऑस्कर की एंट्री के लिए चुना गया था तो ब्लैक को क्यों नहीं भेजा गया?
2. पिछले साल लगे रहो मुन्नाभाई को छोड़कर रंग दे बसंती को ऑस्कर एंट्री बनाए जाने पर विधु विनोद चोपड़ा ने काफी हो-हल्ला किया था और लगे रहो मुन्नाभाई को स्वतंत्र एंट्री के रूप में उतार दिया था। चोपड़ा ने कहा था कि भारत के शांति के संदेश देने वाली छवि को और राष्ट्रपिता के सिद्धांतों को सामयिक बनाने वाली फिल्म की अनदेखी कर हिंसा को बढ़ावा और युवाओं को गलत सोच देने वाली फिल्म को भेजा जाना निराशाजनक है।
खास बात : इस संदर्भ में इस साल के चयन के पीछे सवाल यह भी उठता है कि क्या विधु विनोद चोपड़ा का पिछले साल का दबाव इस साल कारगर रहा? या दो साल पहले ब्लैक के बजाय पहेली के चयन के संदर्भ में इस बार अमिताभ बच्चन का भी कोई प्रभाव रहा?
3. इससे पहले भी उस समय विवाद की स्थिति बनी थी जब राष्ट्रीय चयन समिति ने ऑस्कर के लिए प्रविष्टि भेजने के लिए सूरज बड़जात्या के 3 घंटे लंबे फैमिली ड्रामा हम साथ-साथ हैं और आदित्य चोपड़ा के तीन घंटे के प्रेम प्रसंग मोहब्बतें को तगड़ा दावेदार बताया था हालांकि इसके बाद पांच दिन विचार-विमर्श के बाद कमल हासन की हे राम को चयनित किया गया था। इतने गंभीर मंच पर इस तरह की विचार प्रक्रिया को लेकर काफी आलोचना की गई थी।
राष्ट्रीय पुरस्कार में भी हुआ था विवाद :
ऐसा माना जा सकता है कि सुधीर मिश्रा निर्णायक मंडल में हों तो विवाद अपने आप ही जुड़ जाते हैं। दो साल पहले राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए गठित की गई चयन समिति के अध्यक्ष सुधीर मिश्रा ने हम-तुम के लिए सैफ अली खान को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता की श्रेणी में चुना था हालांकि तब ममूटी, नसीर और मोहनलाल जैसे अभिनेता दौड़ में नहीं थे लेकिन स्वदेस के लिए शाहरुख खान का दावा लगभग 100 फीसदी माना जा रहा था। इस चयन पर चर्चाएं भी हुईं आलोचनाएं भी। आलोचनाओं के घेरे में सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष शर्मिला टैगोर द्वारा प्रभाव का इस्तेमाल करने का जिक्र भी हुआ।
उस समय सुधीर मिश्रा ने दलील दी थी कि राष्ट्रीय पुरस्कार एक ही तरह के सिनेमा को दिए जाते रहे हैं और दूसरी तरह के अच्छे सिनेमा को खारिज किया जाता रहा है इसलिए इसमें बदलाव की जरूरत है। अब सुधीर कहते हैं कि उस समय जो विवाद हुआ सो हुआ लेकिन अब उसका असर यह है कि अभिनय के लिए आलोचना के शिकार रहे सैफ को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के बाद अच्छे अभिनेता के रूप में माना जा रहा है और वे पिछले साल ओमकारा में एक और लाजवाब उदाहरण पेश कर चुके हैं।
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