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या फांसी पर चढ़ेगा या नौलखा हार पहनेगा!

नई दिल्ली. शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के बारे में एक ज्योतिषी ने उनके बचपन में ही भविष्यवाणी कर दी थी कि सरदार किशन सिंह का बेटा या तो फांसी के फंदे पर चढ़ेगा या गले में नौलखा हार पहनेगा।

भगत सिंह के पौत्र यादविंदर सिंह संधु ने परिवार के बड़े सदस्यों से सुनी बातें याद करते हुए साक्षात्कार में बताया कि उनके दादा के गले में तिल जैसा एक निशान था। इस आधार पर ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की थी कि यह लड़का या तो फांसी के फंदे पर चढ़ेगा या फिर इतने उच्च पद पर पहुंचेगा कि इसके गले में नौलखा हार होगा।

यादविंदर ने कहा कि उस ज्योतिषी की सभी बातें सच साबित हुईं। उनके मुताबिक उनके दादा देश की आजादी के लिए फांसी के फंदे पर भी चढ़े और इतने ऊंचे हो गए कि आज हर देशवासी के दिल पर राज कर रहे हैं। नौलखा हार पहनने वाले व्यक्ति को पहले अमीर व्यक्ति के रूप में देखा जाता था और उनके दादा भगत सिंह सचमुच ही लोगों के दिलों पर राज करने वाले और क्रांति नायक और महान देशभक्त के रूप में 'प्रतिष्ठित अमीर' साबित हुए।

यादविंदर ने बताया कि उनका परिवार आर्य समाजी रहा है। जब भगतसिंह के नामकरण संस्कार के समय घर में यज्ञ हो रहा था तो उसी समय शहीद-ए-आजम के दादा अर्जुनसिंह ने कह दिया था कि वे अपने इस पोते को देश के लिए समर्पित कर रहे हैं।

यादविंदर ने बताया कि 1930 में लाहौर सेंट्रल जेल में भगतसिंह और उनके साथियों ने इतिहास की सबसे लंबी भूख हड़ताल रखकर ब्रिटिश हुकूमत को झुका दिया और वह भारतीय कैदियों को जेल में अच्छा खाना और अन्य सुविधाएँ देने पर सहमत हुई। भूख हड़ताल में उनके साथी जतिनदास की मौत हो गई, लेकिन वे फिर भी नहीं झुके और आखिर गोरी सरकार को झुकना पड़ा।

शहीद-ए-आजम के पौत्र ने बताया कि भगत सिंह के जेल जाने के बाद नौजवान भारत सभा की जिम्मेदारी उनके छोटे भाई कुलबीर सिंह पर आ गई। बड़े भाई की अनुपस्थिति में कुलबीर ने सभा की जिम्मेदारी बखूबी निभाई। अंग्रेज सरकार ने कुलबीरसिंह को करीब 10 साल जेल में रखा।

उन्होंने बताया कि 1935 में लायलपुर (पाकिस्तान का फैसलाबाद शहर) में किंग जॉर्ज के नाम से सिल्वर जुबली मन रही थी। अंग्रेजों ने समारोह को रोशनी से जगमग करने के लिए पूरे शहर की बिजली काट दी, जिससे कुलबीर सिंह गुस्से से तिलमिला उठे। उन्होंने किंग जॉर्ज के समारोह का रंग फीका करने के लिए अपने साथी शेरगुल खाँ के साथ बिजली की सप्लाई लाइन काट दी थी। समारोह स्थल कई घंटे अंधेरे में डूबा रहा और यह काफी देर से शुरू हुआ।

1907 में 27-28 सितंबर की रात शहीद-ए-आजम भगत सिंह का जन्म लायलपुर जिले के बांगा गांव में हुआ था, इसलिए 27 और 28 सितंबर को दोनों ही दिन उनका जन्म दिवस मनाया जाता है।

यादविंदर बताते हैं कि भगतसिंह जब छोटे थे, तभी से लोगों को लगने लगा था कि बड़ा होकर वह जरूर कुछ न कुछ करेगा। उन्होंने बताया कि पांच साल की उम्र में एक बार भगतसिंह अपनी मां विद्यावती के साथ खेतों पर गए। माँ ने उन्हें बताया कि किस तरह गन्ने का एक टुकड़ा खेत में रोपने से कई गन्ने पैदा हो जाते हैं। भगत पर इसका इतना असर हुआ कि दूसरे ही दिन वे यह सोचकर खिलौना बंदूक लेकर खेत पर पहुंच गए कि इसे रोपने से कई बंदूकें पैदा हो जाएंगी।





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Mrs Madhu Gujadhur
Thursday, 27th Sep 2007, 20:41
Aise mai ke lal sirf or kewal sirf BHARAT ki dharti per hee paida ho sakte hain.