अभिमत. टीवी विज्ञापन में बॉलीवुड सुपरस्टार शाहरुख खान एक नौजवान को सलाह देते नजर आते हैं कि वह मर्दो के लिए खासतौर पर बनी फेअरनेस क्रीम का इस्तेमाल कर अपनी त्वचा को गोरा बनाए। विज्ञापन के जरिये संदेश दिया गया है कि कामयाब होने की लिए आपकी त्वचा का रंग गोरा होना जरूरी है।
इस विज्ञापन को लेकर ब्रिटेन में बसे एशियाई लोगों में नाराजी है। विरोध करने का वालों का तर्क है कि चमड़ी के रंग को लेकर हमारे साथ पहले ही भेदभाव होता रहा है और शाहरुख खान जैसे बड़े सितारे द्वारा नौजवानों से यह कहा जाना कि जो त्वचा गोरी न हो वह अच्छी नहीं है, समस्याएं और बढ़ाएगा।
जिस विज्ञापन का विरोध किया जा रहा है, उससे संबंधित उत्पाद बाजार में अच्छी-खासी हिस्सेदारी रखता है। ऐसे में सिर्फ विज्ञापन का प्रसारण रुक जाने से लोगों की मानसिकता में बदलाव आ जाएगा, ऐसा सोचना सही नहीं है।
कई लोग ऐसा नहीं मानते कि फेअरनेस क्रीम से रंग गोरा हो सकता है। मगर यह क्रीम त्वचा को गोरी बनाती है, ऐसा विश्वास कितने लोगों को होगा इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि क्रीम बनाने वाली कंपनी द्वारा विज्ञापन के लिए शाहरुख जैसे महंगे कलाकार की सेवाएं ली गई हैं।
अखबारों में वैवाहिक विज्ञापनों पर सरसरी नजर डालने पर पता चलेगा कि भारत में रहने वाली सभी लड़कियों का रंग सिर्फ दो तरह का बताया जाता है- गोरा और गेहुंआ। ऐसे विज्ञापन भी देखने को मिल जाते हैं जिसमें कोई लड़की यह कहते हुए पाई जाती है कि फेअरनेस क्रीम की वजह से उसका बेहतर रिश्ता तय हुआ।
ऐसे विज्ञापन शादी से आगे बढ़कर फिर कामकाजी महिलाओं की कामयाबी तक पहुंच गए। गोरेपन की क्रीम का विज्ञापन करने के लिए शाहरुख को कोसने की बजाय हमें रंग के प्रति अपनी सोच में आमूल-चूल परिवर्तन लाने की जरूरत है। शाहरुख इस उत्पाद का विज्ञापन न करते तो भी शायद इसकी बिक्री में कोई खास कमी नहीं आती।