आलेख. जहां सुदूर पूर्व व यूरोप के कई देश और अमेरिका जैसे मुल्क चीन से आयात होने वाले जहरीले उत्पादों की वास्तविकता को पहचानते हुए अपनी नियामक प्रणाली को और कस रहे हैं, वहीं भारत चीन से आने वाले घटिया और हानिकारक उत्पादों की भयावहता से आंखें मूंदें हुए अपना वही पुराना ‘चलता है’ रवैया अपनाता चला आ रहा है।
न ही हमारी केंद्र व राज्य सरकारें इस तरह के उत्पादों की जांच-पड़ताल कर इन्हें बाहर फेंकने के लिए कोई कदम उठा रही हैं। इसके साथ-साथ भारत उस अवसर को भी नहीं पहचान पा रहा है, जो वैश्विक स्तर पर चीन से आयातित माल के प्रति बढ़ते संदेह के चलते निर्यात के क्षेत्र में उसे मिल सकते हैं।
मिसाल के तौर पर टेक्सटाइल्स को ही ले लीजिए। अमेरिकी वाणिज्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष २क्क्६ में चीन का अमेरिका में टेक्सटाइल्स निर्यात तकरीबन १२ अरब डॉलर रहा, जबकि भारत के संदर्भ में यही आंकड़ा लगभग ३.४ अरब डॉलर रहा। लेकिन टेक्सटाइल्स का क्षेत्र भी ऐसा है, जिसमें जहरीले रसायनों का भय है, इसके चलते भारत इस क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ बना सकता है।
ताइवान में बिकने वाली नब्बे फीसदी से ज्यादा चादरें और पलंगपोश चीन से ही आते हैं और इनमें से ज्यादातर में मेथेनॉल या फ्लोरोसेंट पदार्थ होता है, यह कहना है सरकार से जुड़ी ताइवान सोलिडेरिटी यूनियन के नीति-निर्धारक लाइ हसिन-युआन का, जो इस आयात के धुर विरोधी हैं।
न्यूजीलैंड ने पिछले महीने बच्चों के कपड़ों में घातक स्तर तक फॉर्मेल्डिहाइड पाए जाने की शिकायतों की जांच का आदेश दिया। एक उपभोक्ता निगरानी कार्यक्रम के तहत जब एक वैज्ञानिक की इस संबंध में सेवाएं ली गईं, तो पता चला कि चीनी कपड़ों में फॉर्मेल्डिहाइड की मात्रा सुरक्षित सीमा से ९क्क् गुना अधिक है।
इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी माल की क्वालिटी पर गहराते जा रहे संदेह के परिणामस्वरूप रुपए के बढ़ते भाव के बावजूद भारत के लिए अपना शेयर बढ़ाने का यह बढ़िया मौका है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि भारत इस संदर्भ में तीन महत्वपूर्ण घटकों यानी ब्रांड, लागत और गुणवत्ता में सुधार लाए बिना अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी छाप नहीं छोड़ सकता।
चाहे कपड़े, ज्वेलरी, खिलौने, की-बोर्डस, टूथपेस्ट हों या पालतू जानवरों की भोजन सामग्री, बेबी बिब्स हों या जूस और सीफूड्स; चीन में बने माल को रसायनों और जहरीले पदार्थो की भारी मात्रा के चलते कई देशों से वापस मंगाया जा रहा है। पिछले तीन महीनों के दौरान पनामा, निकारागुआ, कोस्टारिका, हांग-कांग, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, न्यूजीलैंड, जापान, कनाडा और यूरोप में चीन से आयात किए गए टूथपेस्ट में डाईग्लाइकॉल (डाईइथाइलीन ग्लाईकॉल) पाया गया।
यह एक इंडस्ट्रियल जहर है जिसे एंटीफ्रीज में इस्तेमाल किया जाता है। इसकी कीमत टूथपेस्ट में आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले मेडिकल आधार पर स्वीकृत प्रोपिलीन ग्लाइकॉल से तकरीबन आधी है, इसलिए इसे टूथपेस्ट में भी खपाया जा रहा है।
जहां कई देश अपने उपभोक्ताओं के हितार्थ पहले से ही सतर्क हैं, यह एक बहस का विषय है कि भारत सरकार देश के उपभोक्ताओं को इस तरह के घातक उत्पादों से बचाने के लिए कोई कदम उठा रही है या नहीं। इस संदर्भ में सरकार ने कोई कदम उठाया हो, इस बात के ज्यादा प्रमाण नहीं हैं। वर्ष २क्क्७ के पहले छह महीनों में चीन ने आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक भारत को १0.२४ अरब डॉलर का माल बेचा।
लेकिन व्यापारिक सूत्रों का कहना है कि वास्तविक आंकड़ा इससे तकरीबन दोगुना है। भ्रष्ट व्यवसायी चीन से गैर-ब्रांडेड सस्ते उत्पादों का आयात कर उस पर नामी ब्रांडेड कंपनियों के झूठे लेबल चस्पा कर कीमतों के पीछे भागने वाले लेकिन कम जानकारी रखने वाले ग्राहकों के विशाल बाजार में बेचकर अपनी जेबें भर रहे हैं।
सरकारी निकायों की लापरवाही और ऐसे आयात की जांच करने के लिए समुचित उपकरणों का अभाव तथा ग्राहकों में जागरूकता की कमी के साथ यदि बाजार में अफरा-तफरी का माहौल है, तो इस पर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
सीमापार भारत की साख बढ़ती जा रही है। इस लिहाज से दुनिया में चीनी उत्पादों के प्रति बढ़ते संशय के बीच देश के सामने निर्यात के नए रास्ते खोलने का यही उपयुक्त समय है। चूंकि क्वालिटी को ही सबसे ज्यादा चलन में लाना होगा, ऐसे में मनमोहन सिंह सरकार को हमारे विभिन्न सेक्टरों को इसके लिए प्रोत्साहन देने की जरूरत है, जिससे हमारी कीमतें दुनिया के बाजार में ठहर सकें।
लेकिन प्रतिस्पर्धी दुनिया के साथ सौदेबाजी के दौरान समय का ध्यान रखना भी बहुत जरूरी है। यदि हमने तेजी से काम करते हुए आक्रामक ढंग से भारतीय माल को बाजार में धकेलने के साथ-साथ गुणवत्ता में भी सुधार लाने का प्रयास नहीं किया, तो हम चूक जाएंगे।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।