दृष्टिकोण. डॉ. मनमोहन सिंह सरकार ने पिछले कुछ महीनों में जो राजनीतिक आधार तैयार किया था, वह रामसेतु के मामले में अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मारकर फिलहाल गंवा दिया है। राज्यों में लगातार चुनाव हारने के बाद बड़ी मुश्किल से कांग्रेसनीत यूपीए के पक्ष में थोड़ा बहुत वातावरण बनना शुरू हुआ था।
यह भी सही है कि उत्तरप्रदेश के चुनाव के पहले तक भाजपा के हौसले आसमान पर थे। शिवसेना के साथ मिलकर उसने महाराष्ट्र के नगरीय निकाय के चुनाव में फतह हासिल की थी, अकाली दल के साथ मिलकर पंजाब में कब्जा किया और उत्तराखंड को भी भगवा रंग से रंग दिया।
दिल्ली के नगरीय निकाय के चुनाव की सफलता ने भाजपा के नेताओं को इतने उत्साह से भर दिया था कि अरुण जेटली ने यहां तक फरमाया कि यह तो आगामी आम चुनाव का आगाज है। उत्तरप्रदेश के चुनाव में भाजपा की करारी हार के साथ ही वक्त ने पलटा खाया।
लेकिन कांग्रेस और वामपंथियों के बीच चल रहे परमाणु करार विवाद में कांग्रेस के पक्ष में माहौल बन रहा था कि इसी बीच राम के अस्तित्व को लेकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का हलफनामा आ गया और एक बार फिर भाजपा को राजनीति को बैठेठाले ही ऊर्जा मिल गई है। फिर भी यह कहना सही नहीं होगा कि ग्रैंड ओल्ड पार्टी कांग्रेस ने सब कुछ खो ही दिया है।
यह तो स्वाभाविक है कि भाजपा यह अपेक्षा पाले कि अयोध्या के राम मंदिर की तरह ही रामेश्वरम् का रामसेतु मुद्दा भी उसे केंद्र की सत्ता तक पहुंचा सकता है। लेकिन भाजपा को मुगालते में नहीं रहना चाहिए क्योंकि ये दोनों घटनाएं एक जैसी नहीं हैं और एक बार राम के नाम का राजनीतिक कार्ड खेला जा चुका है। इसके साथ ही पूरा देश यह भी जानता है कि अयोध्या में राम मंदिर अभी तक नहीं बन पाया है।
दूसरे एक बार फिर भाजपा के वही पुराने दो चेहरे सामने हैं, लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी। आडवाणी इस बार रथविहीन हैं और वाजपेयी का स्वास्थ्य आड़े आ रहा है। दूसरे कई राज्यों में वह सत्ता में है और निश्चित ही सत्ता के खिलाफ स्वाभाविक जनाक्रोश से उसका वास्ता पड़ेगा। गुजरात, राजस्थान और मध्यप्रदेश में उसके अंतर्विरोध तो उभरकर सामने आने भी लगे हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि धर्म के आधार पर राजनीति के ध्रुवीकरण में रामसेतु मुद्दा असर दिखाएगा, इसकी कोई गुंजाइश फिलहाल नहीं दिखती। पिछले लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ‘राम और रोम’ में से किसी एक को चुनने का जुमला उछाल चुके हैं, जो किसी काम नहीं आ पाया।
हाल के घटनाक्रम को देखते हुए, कांग्रेस फिलहाल रामसेतु मामले को ठंडा होने तक इंतजार करने के मूड में है। कांग्रेस अभी भी परमाणु करार को अपने पक्ष में ट्रम्प कार्ड मानकर चल रही है। यद्यपि भारतीय जनता पार्टी ने भी परमाणु करार के मुद्दे पर वामपंथियों के सुर में सुर मिलाया था जिसकी वजह से कांग्रेस की कई रातों की नींदें हराम रहीं।
पर कांग्रेस के लिए सुकून की खबर यह है कि परमाणु करार के मामले में कामरेडों के बीच भी मतभेद उभरकर सामने आ रहे हैं। पहला संकेत पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य ने दिया है। उन्होंने परमाणु ऊर्जा को देश की जरूरत बताया है। पार्टी के वयोवृद्ध नेता ज्योति बसु ने भी परमाणु करार के मामले में अपने उत्तराधिकारी बुद्धदेब भट्टाचार्य की ही राय का समर्थन किया है।
बहरहाल, इन सबके बावजूद प्रकाश करात एंड कंपनी पश्चिम बंगाल में कामरेडों को पार्टी के सिद्धांतों में रंगे रखने के लिए लाल झंडा फहराए जा रही है। मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री निवास में खासतौर पर रखे सुरुचि प्रीतिभोज में बुद्धदेब भट्टाचार्य को भले ही ज्यादा प्रभावित न कर पाए हों, लेकिन उनकी कोशिशें व्यर्थ नहीं गई हैं।
पार्टी के भीतर कामरेड अपनी लड़ाई अपने ही अंदाज से लड़ रहे हैं। यद्यपि यह सही है कि पार्टी बहुमत और सहमति अभी भी प्रकाश करात के साथ है और बुजुर्आ समाज के साथ संव्यवहार करने वाले पार्टी के सदस्यों को दफ्तर के बाहर अपनी बातें रखने के लिए स्वतंत्र रखा गया है।
बहरहाल, अंध अमेरिकी विरोध को लेकर बुद्धदेब भट्टाचार्य की राय किसे लक्ष्य में रखते हुए जाहिर की गई, इसको लेकर कोई संदेह नहीं रहा। इसी तरह 1996 में प्रधानमंत्री बनने का मौका खो देने की खीझ ज्योति बसु उस कदम को ऐतिहासिक भूल कहकर सार्वजनिक रूप से व्यक्त कर चुके हैं। बुद्धदेव की तरह ज्योति बाबू की भी टिप्पणी पार्टी फोरम के बाहर आई थी।
बताने की जरूरत नहीं कि 1966 में ज्योति बसु को प्रधानमंत्री न बनने देने के निर्णय के पीछे प्रकाश करात ही थे। स्पष्ट है कि माकपा के शीर्ष नेतृत्व में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है। और इसी के चलते हम सब बड़ी जिज्ञासा के साथ उस समय का अनुमान लगा रहे हैं, जब प्रकाश करात यह कहेंगे कि देश को इस परमाणु करार की आवश्यकता के बारे में कोई भी उन्हें संतुष्ट नहीं कर सका। इसके बाद वे सरकार को फिर अगले छह माह के इंतजार के बारे में कहेंगे।
वामपंथी यह भी महसूस कर रहे होंगे कि उन पर चीन और पाकिस्तान के हितों के लिए राजनीति करने के आरोप चुनाव के समय भारी पड़ सकते हैं। ऊपर से उन पर समय से पूर्व चुनाव थोपने की तोहमत लगेगी सो अलग। इस तरह से जो आने वाला राजनीतिक परिदृश्य है वह कांग्रेस पार्टी के लिए अनुकूल ही होने वाला है।
शायद यही गुणा-भाग लगाकर राहुल गांधी को सामने लाने का यही सही वक्त माना गया। राहुल के आने के बाद कांग्रेस नेतृत्व को यह उम्मीद बंधती है कि राहुल नई पीढ़ी में ऊर्जा का संचार करने में कामयाब होंगे। अब इसमें कोई संदेह नहीं कि कांग्रेस अपनी बेहतरी को लेकर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है।
-लेखक राजनीतिक मामलों के टिप्पणीकार हैं।