भोपाल. मुख्य सूचना आयुक्त पीपी तिवारी ने लोकायुक्त रिपुसुदन दयाल के खिलाफ मानहानि का प्रकरण दर्ज कर लिया है। श्री तिवारी के अनुसार एक अपील प्रकरण में सुनवाई शुरू होने और और उसकी अंतिम सुनवाई के एक दिन पहले लोकायुक्त ने उनके घर जाकर मामले के निर्णय को प्रभावित करने का प्रयास किया। यह आचरण पहली नजर में न्यायालय की मानहानि प्रतीत होता है।
इसके बाद प्रदेश की दो संवैधानिक संस्थाओं के मुखियाओं के बीच पिछले एक माह से जारी शीतयुद्ध अब बढ़ गया है। मानहानि प्रकरण की प्रमाणित कापी दैनिक भास्कर के पास मौजूद है। इसमें श्री तिवारी ने लिखा है कि ‘श्री दयाल लोकायुक्त संगठन से संबंधित एक अपील प्रकरण की अंतिम सुनवाई (22 अगस्त 07) के एक दिन पहले शाम 5 बजकर 31 मिनट पर मेरे घर आए।
उन्होंने इसके संबंध में चर्चा करना चाही और मेरा मत भी पूछा। उन (श्री दयाल) का कहना था कि अगर लोकायुक्त संगठन में सूचना का अधिकार अधिनियम लागू कर दिया गया तो लोकायुक्त के लिए जांच करना या विशेष पुलिस स्थापना का अन्वेषण करना कठिन हो जाएगा।
श्री दयाल ने चर्चा के दौरान यह भी कहा कि मैंने जिस दमदारी से मजिस्ट्रेसी की है,उतनी दमदारी से सीजेआई (चीफ जस्टिस आफ इंडिया) ने भी सीजेआई शिप नहीं की होगी।’ इस मुद्दे पर श्री तिवारी ने श्री दयाल के विरुद्ध मानहानि का प्रकरण दर्ज कर अग्रिम कार्रवाई पर विचार के लिए प्रकरण सुरक्षित रख दिया है।
क्या है मामला-
सामान्य प्रशासन विभाग ने 13 अक्टूबर,05 को एक अधिसूचना जारी कर प्रदेश के कुछ गुप्तचर एवं सुरक्षा संगठनों को सूचना का अधिकार अधिनियम के प्रावधानों की परिधि से अलग कर दिया था। इनमें लोकायुक्त सहित राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो, एसएएफ, सीआईडी, पुलिस मुख्यालय की विशेष शाखा और गृह विभाग की सी शाखा शामिल थे।
बाद में मुख्य सूचना आयुक्त के निर्देश पर सामान्य प्रशासन विभाग ने 30 अगस्त, 07 को एक अन्य अधिसूचना जारी कर लोकायुक्त संगठन को छोड़कर बाकी चारों संगठनों को अधिनियम के प्रावधानों की परिधि से बाहर कर दिया। इसके बाद लोकायुक्त संगठन सूचना के अधिकार अधिनियम के अधीन आ गया।
किस अपील पर बढ़ा विवाद-
मुख्य सूचना आयुक्त के पास प्रकाश उपाध्याय विरुद्ध मप्र शासन एवं रामनारायण राठौर विरुद्ध उप पुलिस महानिरीक्षक विशेष पुलिस स्थापना लोकायुक्त के प्रकरण लंबित थे। अपील का निराकरण करते हुए आयुक्त ने पिछले महीने की 23 तारीख को राज्य सरकार को निर्देश दिया कि लोकायुक्त संगठन गुप्तचर एजेंसी नहीं है, लिहाजा उसे सूचना के अधिकार की परिधि में लाया जाए।
लोकायुक्त ने हाईकोर्ट में लगाई याचिका
लोकायुक्त संगठन को सूचना के अधिकार अधिनियम की परिधि में लाने और अदालत में लंबित एक मामले के दस्तावेज देने के मुख्य सूचना आयुक्त के आदेश के विरुद्ध मप्र उच्च न्यायालय में एक याचिका लगाई है।
और भी अपील है लंबित
पुलिस मुख्यालय के स्टेट क्राइम रिकार्ड ब्यूरो में पदस्थ एक पुलिस निरीक्षक जितेन्द्र सिंह तोमर ने सूचना के अधिकार के तहत लोकायुक्त के टीए-डीए,उनसे मिलने आने वालों की सूची,सत्कार पर किए गए खर्च,साल भर में मारे गए छापे, सुप्रीम कोर्ट में अलग से वकील नियुक्त करने, वहां लंबित अपील प्रकरणों और वकील नियुक्त करने के मापदंड के संबंध में जानकारी न मिलने पर मुख्य सूचना आयुक्त के समक्ष अपील की है।
>> मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं है। वो मेरे घर दो बार आए थे तो मैं रिटर्न काल के तहत उनके घर गया था। अगर उन्होंने मेरे खिलाफ मानहानि का प्रकरण दर्ज किया है तो वह असत्य है। मैं पूरे मामले की तहकीकात के बाद ही कह पाऊंगा कि मुख्य सूचना आयुक्त कौन से कानून के तहत कोर्ट है?
-जस्टिस रिपुसुदन दयाल,लोकायुक्त मप्र