सादड़ी. गरीबी से आजिज 64 वर्षीय फारुख कुरेशी को ग्राहक की तलाश है। वह अपना गुर्दा बेचना चाहता है। इसलिए कि मुफलिसी से निजात मिल सके और वह
अपनी लड़कियों की शादी कर सके। वह कहता है- साहब, हमारी तो उमर हो गई। अब जीने की कोई तमन्ना नहीं है। कम से कम बेटियों की शादी का बोझ तो सिर से उतरे। वैसे एक गुर्दे के लोग भी इस दुनिया में रहते हैं, ऐसा मैंने सुना है।
सरकार गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों को बीपीएल परिवारो में चयनित करने का ढिंढोरा तो खूब पिटती है परन्तु इस योजना का सही फायदा गरीब परिवारों को कितना मिल पाता है, इसकी बानगी है सादड़ी का फारूख कुरेशी। उसने अपने परिवार को बीपीएल सूची में चयनित कराने के लिए 23 फरवरी, 2004 को गरीबी सुनवाई केंद्र राजभवन में पहुंच गुहार लगाई। वहां से मुख्यमंत्री को आवश्यक कार्यवाही के लिए लिखा गया परन्तु बात नहीं बननी थी, सो नहीं बनी। फारुख को आंखों से कम दिखता है और उसके कंधों पर पांच सदस्यों का जिम्मा है।
परिवार में 50 वर्षीया उसकी पत्नी जुली, विकलांग पुत्री रजिया (19), पुत्र नजीर (18), पुत्री हिना (17) व पुत्री जेबा (14) हैं। तीनों ही पुत्रियां शादी के लायक हो रही हैं। फारुख को रात- दिन उनके निकाह की चिन्ता खाये जा रही है। तंगी का आलम यह है कि परिवार भुखमरी के कगार पर है। न कोई कामधंधा हाथ में है और न आमदनी का कोई जरिया। पुश्तैनी विरासत के नाम पर भी जिंदा रहने के ठोस बहानों से भी यह परिवार महरूम है।
फारुख का कहना है कि मैं एक गुर्दा बेच कर अपनी तीनों पुत्रियों का निकाह करना चाहता हूं। मर भी गया तो कोई गम नहीं। बेटियां अपने घर तो चली जाएंगी। उसने इस संवादाता से बातचीत में खुल कर कहा- मुझे सरकारी खैरात नहीं चाहिए। मुझे मेरा हक चाहिए था, जो नहीं मिला। गुर्दा बेचने के उसके निर्णय पर उसकी पत्नी को भी कोई एतराज नहीं। रुंधे गले से उसने कहा- हमारे पास इसके अलावा और रास्ता ही क्या है। क्या बीपीएल सूची में हमारा अधिकार नहीं बनता जबकि आर्थिक दृष्टि से संपन्न एवं राजनैतिक पहुंच वाले कई परिवार बीपीएल सूची में शामिल हैं?