अभिमत. शतरंज के खेल में लगातार 15 वर्षो से भारत का परचम लहरा रहे विश्वनाथन आनंद ने दूसरी बार विश्व चैंपियनशिप जीतकर हॉकी, क्रिकेट और बिलियर्डस के बाद ‘चक दे’ की सीरीज में भी अपना योगदान दे दिया है। आनंद ने हंगरी के पीटर लेको के साथ बाजी ड्रॉ कर यह उपलब्धि हासिल की। इसके पहले उन्होंने 2000 में यह चैंपियनशिप जीती थी।
इस बार उनकी उपलब्धि इस मायने में विशेष है कि तब रूस के गैरी कास्परोव विश्व के नंबर एक खिलाड़ी थे जबकि इस बार विश्व शतरंज संघ की शीर्ष रैंकिंग पर भी आनंद काबिज हैं। गत अप्रैल में स्पेन की लीनारेस चैंपियनशिप जीतने के बाद वे विश्व शतरंज के सिरमौर बनकर उभरे।
शतरंज से आनंद का जब परिचय हुआ तब यह खेल क्लबों और भारत सोवियत संस्कृति केंद्रों में खेला जाता था। चेन्नई के एक क्लब में उनकी बहन उन्हें ले गईं और उन्हें इसका चस्का लग गया। क्लब में सीमित बोर्ड होते थे, जीतने वाला खिलाड़ी खेलता रहता था जबकि हारने वाले को लाइन में लगना पड़ता था। आनंद लगातार जीतने के बारे में सोचते थे और इसी ने उनमें जीतने की आदत डाल दी जिसकी अन्य खेलों के भारतीय खिलाड़ियों में कमी है।
आनंद का उदय एक अन्य अर्थ में भी महत्वपूर्ण है। जिस प्रकार अफ्रीकी शारीरिक क्षमता के एथलेटिक्स जैसे खेलों में सिद्धहस्त होते हैं, वैसे ही आनंद के खेल ने न्यूरो मस्क्यूलर खेलों में हमारे कौशल को रेखांकित किया।
यह संयोग नहीं है कि शतरंज में आनंद का ग्राफ बढ़ने के साथ गोल्फ, बिलियर्ड, स्नूकर, तीरंदाजी और निशानेबाजी जैसे न्यूरो मस्क्यूलर खेलों में हमारे देश का अंतरराष्ट्रीय फलक पर ग्राफ ऊंचा उठा और आज इन खेलों में हमारे पास अंतरराष्ट्रीय स्तर के कई खिलाड़ी है।
शतरंज में तो हमारे पास पी हरिकृष्णा, कोनेरू हम्पी, कृष्णन शशिकिरण प्रति सेकंड जैसे अनुभवी खिलाड़ियों से लेकर परिमार्जन नेगी जैसे किशोर खिलाड़ियों की दूसरी ही नहीं, तीसरी पंक्ति भी तैयार है। जाहिर है कि आनंद के नेतृत्व में भारत का यह आनंदोत्सव लंबे समय तक जारी रहेगा।