दृष्टिकोण. हाल ही में आयोजित 53वें राष्ट्रमंडल संसदीय सम्मेलन में लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने निर्वाचित प्रतिनिधि की जवाबदारी सुनिश्चित करने के लिहाज से उन्हें ‘वापस बुलाए जाने’ के सिद्धांत को अपनाए जाने की वकालत की।
संसद की कार्यवाही में बार-बार होने वाले व्यवधानों के कारण ज्यादातर प्रतिनिधि वैधानिक मापदंडों पर खरे नहीं उतर रहे हैं। इसलिए चटर्जी ने प्रावधान रखा कि जिस तरह जनता सरकार को बदल सकती है, उसी तरह उसे प्रतिनिधि को वापस बुलाए जाने का अधिकार भी मिले।
इससे पहले पूर्व चुनाव आयुक्त टीएस कृष्णमूर्ति ने तत्कालीन सरकार से सिफारिश की थी कि मतदाता को ‘नकारात्मक मतदान’ का अधिकार मिले। यदि इस तरह के प्रस्तावों पर भविष्य में अमल किया जाता है, तो राजनीति में अपराधीकरण और भ्रष्ट प्रत्याशियों को टिकट दिए जाने पर अंकुश लगेगा। इससे राजनीतिक दलों को सबक मिलेगा और देश में एक नए युग का सूत्रपात संभव होगा।
भारतीय लोकतंत्र और राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में जो अनिश्चय, असमंजस और हो-हल्ला का कोहरा छाया हुआ है, इतना गहरा और अपारदर्शी पहले कभी देखने में नहीं आया। राष्ट्रीय हित व क्षेत्रीय समस्याओं को हाशिए पर छोड़ जनप्रतिनिधियों ने जिस बेशर्मी से सत्ता को स्वयं समृद्धि का साधन बना लिया है, उससे लोकतंत्र का लज्जित होना स्वाभाविक है।
इन स्थितियों में मतदाता को नकारात्मक मतदान का अधिकार यह सोचने के लिए बाध्य करेगा कि लोकतंत्र का प्रतिनिधि ईमानदार, नैतिक दृष्टि से मजबूत और जनता के प्रति जवाबदेह हो। इसलिए अब संविधान में संशोधन कर प्रत्याशियों को अस्वीकार करने का अधिकार दे ही दिया जाना चाहिए।
हालांकि 1996 में आम चुनावों के दौरान एक बड़े जनसमूह में आंदोलित हो रही इस मंशा से कर्नाटक और आंध्रप्रदेश की एक-एक लोकसभा व तमिलनाडु की एक विधानसभा सीट पर बड़ी संख्या में उम्मीदवार खड़े किए गए थे। उम्मीदवारों की भीड़ को लेकर चुनाव आयोग भी विवश हो गया और अंतत: आयोग को चुनाव प्रक्रिया स्थगित करनी पड़ी थी। जनता द्वारा की गई यह कार्रवाई उम्मीदवारों को नकारने की दिशा में एक शुरुआत थी।
क्षेत्रीय मतदाताओं की यह एक सोची- समझी रणनीति थी जिससे पूरी चुनाव प्रक्रिया को असहज व असंभव बनाकर उम्मीदवारों के विरुद्ध जनता द्वारा उन्हें नकारने की अभिव्यक्ति को धरातल पर लाने के लिए मोदाकरीची विधानसभा क्षेत्र में अकेले तमिलनाडु कृषक संघ ने 1028 प्रत्याशी खड़े किए थे। आंध्रप्रदेश के नलगोंडा और कर्नाटक के बेलगाम संसदीय क्षेत्रों में क्रमश: 480 और 446 प्रत्याशी मैदान में उतारे गए थे।
इस सिलसिले में नलगोंडा किसान संघ के नेता इनुगु नरसिम्हा रेड्डी का कहना था कि हमारा मकसद चुनाव जीतना नहीं, उन राजनेताओं के मुंह पर चपत लगाना है, जो पिछले 15 सालों से हमारे संघ द्वारा उठाई जा रही सिंचाई समस्याओं के प्रति उदासीन, लापरवाह व निष्क्रिय रहे। बेलगाम की समस्या भी इसी तरह की थी।
लिहाजा तय है कि चुने प्रतिनिधियों द्वारा डेढ़ दशक में भी चुनावी वादे पूरे नहीं किए जाने के कारण कृषक संघों ने जनप्रतिनिधियों के प्रति विरोध जताने व उन्हें नकारने की दृष्टि से चुनाव प्रक्रिया को खारिज करने के लिए बड़ी संख्या में उम्मीदवारों को खड़ा किया।
यदि मतदाता के पास वर्तमान उम्मीदवारों को नकारने का अधिकार मतपत्र में मिला हो, तो वह मतपत्र में उल्लेखित प्रतिनिधियों को नकारने के पक्ष में वोट देकर अपने आक्रोश को वैधानिक अभिव्यक्ति देते।
हालांकि राजनेता और राजनीतिक दल आसानी से मतदाता को नकारने अथवा कार्यकाल के बीच में वापस बुलाने का हक नहीं देने देंगे, क्योंकि इससे प्रत्येक राजनेता के भविष्य पर हर चुनाव में नकारे जाने अथवा वापस बुलवाए जाने की तलवार लटकी रहेगी।
वर्तमान में राजनीतिक दल मुद्दाविहीन हैं और नकारात्मक वोट प्राप्ति के लिए जोड़-तोड़ बैठाते रहते हैं। ऐसी मन:स्थिति में मतदाता सत्ता परिवर्तन से ज्यादा आचरणहीन सत्ताधारियों को अस्वीकार करने की इच्छा पाले हुए हैं, जिससे व्यवस्था की जड़ता दूर हो और उसमें गतिशीलता आए।
मतदाता को निर्वाचित प्रतिनिधि वापस बुलाने का अधिकार देने से बचने के लिए हमारे नीति निर्माता चाहेंगे कि चुनाव क्षेत्रों में प्रत्याशियों की या तो एक निश्चित संख्या तय कर दी जाए अथवा निर्दलीय उम्मीदवार के चुनाव लड़ने का अधिकार समाप्त कर दिया जाए। लेकिन निर्वाचन संपन्न कराने के आधार में नागरिक के बुनियादी अधिकार शामिल हैं, जिसमें प्रत्येक नागरिक को मतदान करने व चुनाव लड़ने के अधिकार प्रदत्त हैं।
लोकसभा व विधानसभा में आपराधिक प्रवृत्ति, सत्ता व धनलोलुप मानसिकता के जो प्रतिनिधि पहुंचते हैं, वे वैधानिक-अवैधानिक तरीके से अपने आर्थिक स्रोत मजबूत करने में जुट जाते हैं और आमजन व इलाके की समस्याओं को भूल जाते हैं। ऐसे में दोबारा कमोबेश एक जैसी ही मानसिकता वाले उम्मीदवारों में से मतदाता किसे चुनें?
किसी भी प्रत्याशी को न चुनने का अर्थ यह कदापि नहीं लगाना चाहिए कि संपूर्ण चुनाव प्रक्रिया को अस्वीकार किया जा रहा है, बल्कि इसका तात्पर्य यह होना चाहिए कि क्षेत्र का बहुमत व्यवस्था को चलाने वाले ऐसे प्रतिनिधियों को नकार रहा है, जो अपनी निष्क्रियता, लापरवाही और स्वार्थपरकता के लिए उदाहरण बन चुके हैं।
अस्वीकार किए गए उम्मीदवारों को दोबारा चुनाव लड़ने से भी वंचित रखा जाना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 19 के भाग क में नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है, लेकिन निर्वाचन के समय मतदाता के पास जो मतपत्र होता है उसमें केवल मौजूदा उम्मीदवारों में से किसी एक को चुनने का प्रावधान है, न चुनने का नहीं।
यदि कालांतर में संविधान में संशोधन कर नागरिक को नकारात्मक मत और निर्वाचित प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार दिए जाने की व्यवस्था की जाती है, तो चुनाव सुधार की दिशा में यह महत्वपूर्ण निर्णय होगा। समाज सुधार की दिशा में संकल्पित व अग्रणी व्यक्ति आगे आएंगे, जनकल्याण के कामों के लिए होड़ चलेगी।
प्रतिनिधि अपने दायित्वों के प्रति सचेत व क्षेत्रीय विकास के लिए प्रयत्नशील रहेंगे। अन्यथा भारतीय लोकतंत्र पर निराशा तथा अनिश्चय के बादल घने होंगे तथा नागरिक व प्रतिनिधि के बीच अविश्वास की दूरियां उत्तरोत्तर बढ़ेंगी तथा प्रतिनिधि मीडिया में छा जाने के लिए लोकसभा और विधानसभाओं में अवरोध पैदा करने के लिए बेवजह हल्ला मचाते रहेंगे।
-लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।