सम्पादकीय. सुप्रीम कोर्ट ने सेतुसमुद्रम परियोजना पर शीघ्र अमल की मांग के समर्थन में सोमवार,1 अक्टूबर को आहूत तमिलनाडु बंद पर रोक लगाकर राज्य की द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम को करारा झटका दिया है। देश की शीर्ष अदालत ने अवकाश के दिन बैठकर जिस तरह से अन्ना द्रमुक की फौरी याचिका की सुनवाई की, उससे इस मामले में उसकी गंभीरता का भी पता चलता है।
वस्तुत: सुप्रीम कोर्ट का रविवार का फैसला उसके द्वारा 1998 में दिए गए उस ऐतिहासिक फैसले का दोहराव भर है जिसमें बंद के आयोजन को गैर-कानूनी और असंवैधानिक करार दिया गया था, लेकिन कोर्ट को नए सिरे से दखल इसलिए देना पड़ा कि द्रमुक नेतृत्व उसके नौ साल पुराने फैसले की सरासर अनदेखी कर राज्यव्यापी बंद के आयोजन पर आमादा था।
कार्यवाहक प्रधान न्यायाधीश जस्टिस बीएन अग्रवाल और जस्टिस पीपी नाओलेकर की बेंच ने बंद की तमिलनाडु सरकार और द्रमुक के वकीलों की खोखली और गोल-मोल दलीलों पर तीखी टिप्पणियां करके गहरी नाराजगी तो जताई ही, साथ ही अपनी यह पीड़ा भी उजागर की कि देश में न्यायपालिका के फैसलों-आदेशों के उल्लंघन की प्रवृत्ति बेलगाम होती जा रही है और छोटे-बड़े हर तरह के मामलों में कोर्ट को दखल देना पड़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले की प्रतिक्रिया में द्रमुक नेतृत्व ने सोमवार को बंद न करने और उसकी जगह पूरे राज्य में उपवास के आयोजन का फैसला लेकर समझदारी दिखाई है। इस मामले में टकराव का रवैया अपनाकर वह संवैधानिक संकट को तो न्योता देता ही, अपनी साख भी दांव पर लगा देता।
शीर्ष अदालत द्वारा बंद की अवधारणा को गैर-कानूनी और असंवैधानिक करार दिए जाने के पीछे ठोस आधार रहे हैं। कोर्ट का मानना है कि बंद के आयोजन से जन-जीवन पूरी तरह पंगु हो जाता है, जो कि संविधान के अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 ( जीवन और शरीर की स्वतंत्रता) के तहत नागरिकों को मिले मूल अधिकारों का उल्लंघन है।
और जब सत्तारूढ़ पार्टी ही बंद का आयोजन कर रही हो, तब तो एक संवैधानिक संस्था द्वारा मूल अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति आ जाती है, जिसे कोर्ट कतई स्वीकार नहीं कर सकता है। कोर्ट के ताजा फैसले के बाद सभी संबंधित पक्षों के पास बंद के राजनीतिक हथियार को हमेशा के लिए तिलांजलि दे देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।