मुंबई. आजादी के 60 सालों में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सिद्धांतों की उपेक्षा कर हमने जो विकास का मॉडल अपनाया, उसने देश के अंदर दो देश बना दिए हैं। एक देश के लोग करोड़ों रुपए की बेंटले कार चला रहे हैं, तो दूसरे बैलगाड़ी पर हैं, लेकिन जहां पहले वर्ग की तादाद बेहद सीमित है, वहीं दूसरा वर्ग तेजगति से बढ़ रहा है। यह कहना है महात्मा गांधी के पड़पोते तुषार गांधी का। गांधी जयंती समारोह में भाग लेने के लिए इंडोनेशिया के बाली द्वीप रवाना होने से घंटा भर पहले भास्कर डॉट कॉम से तुषार गांधी ने खास बातचीत की।
नेहरु नहीं इंदिरा ज्यादा जिम्मेदार: तुषार गांधी ने कहा कि बापू के सिद्धांतों को तो आजादी के कुछ साल पहले ही कांग्रेस ने ठंडे बस्ते में डाल दिया था। इसके लिए उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी और देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उनका विकास का मॉडल शुरू से ही गांधी से अलग था। यह बात नेहरू उनके सामने भी स्वीकार की थी।
नेहरू के बाद के शासक शासन की नीतियों में गांधी को पूरी तरह दरकिनार करने के लिए जिम्मेदार हैं। उनसे विकास के नेहरु मॉडल की समीक्षा कर वापस गांधी मॉडल की ओर लौटने की उम्मीद थी। गांधी हमेशा कहते थे कि अंतिम पंक्ति के व्यक्ति को ध्यान में रखकर शासन की नीतियां बनाई जाएं, लेकिन सरकार ने जो विकास का मॉडल अपनाया, उसमें गरीब और निचले तबके की सर्वथा उपेक्षा की गई। नतीजा सबके सामने है। इस स्थिति के लिए इंदिरा गांधी अधिक जिम्मेदार हैं। क्योंकि वे नेहरू के बाद सबसे अधिक समय तक देश की प्रधानमंत्री रहीं।
सबका सामूहिक दायित्व: भारतीय जनमानस हमेशा सच्चई से भागता है। उसके घर के भीतर कितनी भी सड़ांध हो, वह उसकी बाहरी दीवालों को पोतकर उसके सामने रंगोली बना देता है, ताकि बाहर से देखने में उसका घर सुंदर लगे। हमारी विकास की नीतियां भी इसी तरह की हैं। गांधी कहते थे विकास की शुरुआत निचले पायदान से शुरू होनी चाहिए। हमारी आर्थिक नीतियां ऊपरी स्तर पर मौजूद ऐश्वर्य को और आभामय बनाने पर जोर देती हैं। उनका मानना है कि ऊपर का यह ऐश्वर्य छलककर अपने आप निचले तबके तक पहुंच जाएगा, लेकिन इस छलकते ऐश्वर्य को लपकने के लिए बीच में कई बांध बन गए हैं जो इसे नीचे तक आने ही नहीं देते।
किस बात का टोस्ट: पिछले दिनों वित्त मंत्री पी चिदंबरम अपनी अमेरिका यात्रा में देश के आर्थिक विकास पर अपनी पीठ थपथपाते हुए टोस्ट कर रहे थे। किस बात का टोस्ट। आज देश में कई लोग भूख से मर रहे हैं। ऐसे में उनको जाम उठाते देखना बेहद पीड़ाजनक है। उन्हें इस बात का एहसास तक नहीं कि आज देश में प्रेशर कुकर जैसे हालात निर्मित हो रहे हैं। सीमित तबके के विकास पर पीठ थपथपाने वाली सरकार बहुसंख्यक वर्ग की उपेक्षा कर रही है। नतीजतन, उसके बीच असंतोष बढ़ता जा रहा है। इंडिया बूम की सच्चई को इसी बात से समझा जा सकता है कि देश की आर्थिक महानगरी मुंबई से कुछ ही फासले पर मौजूद ठाणो के आदिवासियों के सामने भुखमरी के हालात पैदा हो गए हैं।
महात्मा गांधी चाहते थे, भारत लीडरशिप करे: महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत समेत दूसरे एशियाई देशों में प्रीमियर पोजीशन पर जाकर विश्व की लीडरशिप करने की क्षमता है। इसके लिए वह अपनी स्ट्रेंथ का इस्तेमाल करे, लेकिन आज जिस रास्ते से लीडरशिप की बात की जा रही है वह रास्ता उनके सिद्धांतों से बिलकुल अलग है। बेहतर हो सरकारें जल्दी ही अपने चुने गए रास्तों की समीक्षा कर गांधी द्वारा बताए गए रास्ते में लौंटे, अन्यथा इसके गंभीर परिणाम होंगे, यह तय है।