मुंबई. गांधी एक ब्रांड बन चुके हैं। क्रिकेट और बॉलीवुड के बाद अगर कोई शब्द सबसे ज्यादा असरदार है तो वह है गांधी। फिर चाहे वह आपका सरनेम हो या वाद का हिस्सा। किसी भी तरह से गांधी से जुड़ाव का मतलब ही है कि आप महात्मा की बिरादरी के ही हिस्से हैं, बेशक महात्मा न हों।
इस देश में गांधी के नाम पर कम से कम चार विरासतों की दावेदारी चल रही है। एक विरासत का प्रतिनिधित्व करते हैं तुषार गांधी, जिन्होंने कुछ वक्त पहले सीएमजी वर्ल्डवाइड को गांधी के नाम और उनकी तस्वीरों के प्रॉपराइटरी राइट्स बेचने की कोशिश की थी। (बाद में गांधीवादियों के प्रदर्शन और विरोध और होहल्ले के बाद यह प्रयास ठप हो गया था)। यानी इसे आप दो तरह से देख सकते हैं। एक तो गांधी का दुनिया की आर्थिक राजनीति में प्रवेश। यानी गांधी के नाम पर कुछ भी बिक सकता है। बेशक भारत में नहीं, तो विदेशों में ही सही। दूसरी तरफ इस नाम के जरिए आप विश्व राजनीति के परिदृश्य में अपनी जगह हासिल कर सकते हैं। आपको दुनिया सिर्फ इसीलिए सलाम भी करेगी।
गांधी के दूसरे दावेदार हैं संग्रहालय, आश्रम और संस्थाएं जो इस देश में महात्मा के जाने के बाद खड़े हुए। अब ये सभी जगहें पर्यटन केंद्र में तब्दील हो गए हैं। यहां सालाना गांधी के हजारों-लाखों दीवाने पहुंचते हैं। हालांकि इन संस्थाओं में गांधी कहीं हैं भी या नहीं, यह शोध का विषय है। गांधी के दो और दावेदार हैं जो गांधी रूपी ब्रांड का सफलतापूर्वक इस्तेमाल करते रहे हैं। ये हैं उनके अनुयायी यानी गांधीवादी और गांधी के नाम पर उठाए गए आंदोलनों के संचालक।
इन सभी दावेदारों ने आनुवांशिक तौर पर चाहे वे उनके परिवार से संबंधित हों या नहीं, हर अच्छी चीज को और बुरी को भी, गांधी के नाम पर बाजार में रख दिया। चाहे फिर वह राजनीति हो, समाज या अर्थ। 1920 और 30 के दशकों में तो गांधी के नाम पर बीड़ियां तक बिका करती थीं। हालांकि गांधी ने खुद इसके लिए जनता के सामने माफी मांगी कि उन्होंने ऐसा करने को नहीं कहा था। बाद में जब उन्हें महात्मा बनाया गया तो इस प्रैक्टिस के खिलाफ आंदोलन खड़े हुए।
अब दूसरे नजरिए से देखें। अगर बाजार की बात करें, तो कई कंपनियों के लिए गांधी की छवि एक ब्रांड ही नहीं बल्कि ब्रांड एंबेसडर का काम करती है। गांधी छाप माचिस से लेकर फिटनेस जिम (अमेरिका में) तक गांधी के विचारों का सहारा ले रहे हैं। कुछ महीने पहले मल्टीनेशनल कंपनी सीएमजी ने महात्मा गांधी के नाम, चित्रों और शब्दों को हमेशा के लिए अपना बनाने के लिए विशेषाधिकार पाने के लिए मसौदा तैयार कर महात्मा के पड़पोते तुषार गांधी से संपर्क किया था। कुछ होता, इससे पहले ही गांधीवादी कूद पड़े और यह योजना सिरे न चढ़ सकी।
महात्मा गांधी के पोते राजमोहन गांधी ने कहा था कि व्यापारिक क्षेत्र में गांधी के नाम का दुरुपयोग रोकने के लिए नियंत्रण होना चाहिए। इस पर पूर्व मंत्री नटवर सिंह का कहना था कि गांधी किसी की निजी संपत्ति नहीं हैं। राज्य सभा सांसद रहे कुलदीप नैयर ने अफसोस जताया था कि सब कुछ वाकई बेहद दुखद है क्योंकि गांधी अनगिनत दिलों में बसते हैं। यह कंपनियों की चाल है, वे हमारी भावनाओं की कीमत वसूलना चाहती हैं।
फिल्मों में गांधीवाद (यानी गांधीगीरी) की सफलता से सब वाकिफ हैं ही, इसे इस क्षेत्र में भी सहेजा जा रहा है। गांधी के ऑडियो टेप प्रसार भारती के हाथ में हैं, मगर उनके फोटोग्राफ का कॉपीराइट है कनु गांधी, विट्ठलभाई जवेरी ट्रस्ट के पास। गांधी के लेखन के कॉपीराइट हैं नवजीवन ट्रस्ट के पास तो उनकी रील फिल्में फिल्म फाउंडेशन, फिल्म विभाग और अन्य अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के अधिकार क्षेत्र में हैं। इन्हें ऐसे सहेजा जा रहा है कि लोगों तक इसके अंश भी नहीं पहुंच पा रहे।
राजनीतिक प्रचार के मामले में देखें, तो एक इतिहासकार ने लिखा था कि भारत में लोकतंत्र के 25 साल बाद भी अंदरूनी भारत के हालात ऐसे हैं कि लोग वोट देने से पहले पूछते हैं महात्मा गांधी का निशान कौन सा है। लेकिन इस बात को बाद के राजनीतिक विश्लेषकों ने समझ लिया था कि गांधी जैसे सिक्के को चलन से बाहर नहीं होने देना है। जाहिर है, आप गांधी तो बन नहीं सकते, गांधीवाद की चादर तो ओढ़ ही सकते हैं। एक कॉंन्सेप्ट के बतौर गांधी की अपने हिसाब से व्याख्या करते हुए नेता बन जाइए।
गांधीवाद पर आधारित कई नीतियों को बढ़ावा देने वाले भारत में विरसे में मिले गांधीत्व पर राजनीति, राजनीति में गांधीवाद की दुहाई और गांधीवाद पर राजनीति के आरोप जब-तब सुनाई देते ही रहते हैं। शर्मनाक स्थिति तो तब होती है जब नेता अपने मकसदों (वोट) के लिए गांधी के नाम का इस्तेमाल करते दिखाई देते हैं।
धर्म को लेकर भी गांधीवाद के बारे में तरह-तरह की बातें प्रचारित की गई हैं। जीवन भर छुआछूत को खत्म करने और सांप्रदायिक सौहाद्र्र को स्थापित करने में लगे रहे गांधी को बंटवारे का जिम्मेदार बताने में भी लोग नहीं कतराते। जरूरत के मुताबिक गांधी के हिंदुत्व को भी हथियार बनाने में चूक नहीं होती।
बहरहाल, गांधी पर ताजा फिल्म गांधी माय फादर के आखिरी दृश्य में गांधी का एक संवाद है : जानते हो मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी हार क्या है! मैं दो लोगों को अपनी बात कभी नहीं समझा सका - एक मेरा काठियावाड़ी दोस्त जिन्ना और एक मेरा अपना बेटा हरिलाल।.. और अब उनकी बात कितने लोग समझते हैं? गांधी शायद अपने जीवन में भी यह नहीं समझ पाए थे कि एक दिन उनका नाम ही दुनिया के चुनिंदा ब्रांडों की लिस्ट में शामिल होगा (ब्रांड्सऑफदवर्ल्ड डॉट कॉम पर गांधी दुनिया भर में 37वें नंबर पर आते हैं)।