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महात्मा के आदर्श/दर्शन

मुंबई. एक आध्यात्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और सर्वकालिक नेता के रूप में महात्मा को याद किया जाता है और उनकी इस छवि का कारण उनके कर्म के साथ-साथ उनके विचार हैं जिन पर उन्होंने अमल कर दुनिया भर के लिए मिसाल कायम की। भारतवर्ष की स्वतंत्रता के लिए उनके सिद्धांत जितने कारगर साबित हुए उतने ही व्यक्ति और मन की स्वतंत्रता के लिए भी उपयुक्त हैं। अपने अनुभवों से महात्मा ने एक दर्शनशास्त्र रचा और फिर उसे व्यवहार में उतारकर एक आदर्श। उनके दर्शन या आदर्शो के प्रमुख सूत्र :

सत्य :
महात्मा गांधी ने जीवन भर अपने अनुभवों में सत्य की खोज की और इसे अपनी आत्मकथा सत्य के साथ मेरे प्रयोग में आकार दिया। गांधी का मानना था कि मानव सभ्यता को नष्ट करने वाले किसी भी हथियार से कहीं ज्यादा शक्तिशाली है सत्य। गांधी ने अपने विचारों को पहले इस सूत्रवाक्य में प्रस्तुत किया था ‘ईश्वर ही सत्य है’। फिर अपने प्रयोगों के हवाले से उन्होंने स्थापित किया कि ‘सत्य ही ईश्वर है’।

अहिंसा :
अहिंसा की सबसे बड़ी मिसाल के रूप में स्थापित व्यक्तित्व हैं महात्मा गांधी। गांधी का कहना था कि कठिनतम परिस्थिति में भी हिंसा कोई विकल्प है ही नहीं। अहिंसा पर उनके विचार : अगर आंख के बदले आंख का कानून हो तो दुनिया अंधी हो जाएगी; सृजन की अपेक्षा विध्वंस हमेशा आसान होता है; कई कारण हैं कि मैं मरने के लिए तैयार रहूं लेकिन इसका कोई कारण नहीं कि मैं मारने के लिए तत्पर हो जाऊं।

चरखा/खादी :
खादी या ‘अपना वस्त्र’ अपनाना गांधी के लिए मात्र विदेशी विरोध नहीं था बल्कि इसके पीछे सोच थी कि भारत की गरीबी और सामाजिक-आर्थिक अंतर की खाई पाटी जाए। कर्म और स्वाबलंबन के सूत्र भी इस विचार के पीछे छुपे थे। कांग्रेस के हर सदस्य से उन्होंने अपील की कि रोज चरखे पर कपड़ा कातने में समय दें। इस ‘गांधी विचार’ से कई नेता प्रभावित हुए और मोतीलाल नेहरू ने खादी के पक्ष में लंदन मेड कपड़े त्याग दिए।

उपवास :
उपवास के महत्व को रेखांकित करते हुए गांधी ने कहा है कि यह इंद्रियों की जरूरतें सीमित करने का रास्ता है और इस अभ्यास से शरीर को मन के नियंत्रण में लाया जा सकता है। निज जीवन में कठोर व्रत रखने वाले गांधी ने तीन मौकों पर आमरण अनशन भी रखा : 1922 में चौरा-चौरी कांड में हिंसक प्रतिरोध के समय; 1934 में सांप्रदायिक राजनीति के विरोध में और 1947 में बंगाल और दिल्ली में हिंसा को रोकने के लिए।

ब्रrाचर्य :
36 वर्ष की उम्र में गांधी ने ब्रrाचर्य का व्रत धारण किया और निश्चय किया कि वे मन, इंद्रियों और कर्म पर नियंत्रण रखेंगे। गांधी के लिए ब्रrाचर्य केवल वासना को शांत कर मन शुद्ध करने का उपाय ही नहीं था बल्कि इससे ज्यादा इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि वे अपनी पत्नी के लिए प्रेम को शुद्ध करना चाहते थे और अपने भीतर से गुस्से (उनके अनुसार हिंसा का एक रूप) जैसी मनोवृत्तियों को पूरी तरह मिटाना चाहते थे।

भाईचारा/सौहाद्र्र :
अछूतों के लिए हरिजन शब्द देने वाले गांधी ने एक समाजसेवक के रूप में अस्पृश्यता के कलंक को मिटाने के लिए बड़ा आंदोलन चलाया। इसके अलावा वे हमेशा हिंदू-मुस्लिम एकता व भाईचारे के लिए तत्पर रहे। 6 अक्टूबर 1946 को अपने पत्र हरिजन में उन्होंने लिखा था :

.. मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग बिल्कुल गैर-इस्लामी है और मुझे यह कहने में भी हिचक नहीं है कि यह पाप है। इस्लाम मानव सभ्यता में भाईचारे और एकता का संदेश देता है.. यानी कि जो लोग इस आधार पर भारत का बंटवारा चाहते हैं वे भारत और इस्लाम के दुश्मन हैं। वे लोग मेरे दो टुकड़े कर सकते हैं लेकिन मुझे ऐसा कोई काम करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते जिसे मैं गलत समझता हूं।..





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